Wednesday, April 17, 2019

Journey to Delhi Nizzamuddin and Osho Ashram Pune Part-1

Journey to Nizamudin, Osho Ashram Pune Part -1

आइए ले चलता हूँ आपको एक ऐसी यात्रा पर, जिसमें दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह,  कव्वालियां, नुसरत फतेह अली खान, कव्वाली की मस्ती ,ओशो आश्रम पुणे में मेडीटेशन का अनुभव।

पिछली यात्रा में एक बात बताना भूल गया था कि होली वाले दिन मेरे दो दोस्त विवेक पाठक और  जगमीत सिंह जग्गी ने मुझे निमंत्रण दिया था, जिसने होली के लिए पर मैं वहां नहीं जा पाया उसने मेरी पकौड़े बनाकर रखे हुए हैं।  यह पकौड़े  फिर कभी जरूर खा जाएंगे क्योंकि यह मेरे पर उधार हैं।


पूना यात्रा, दिल्ली रेलवे स्टेशन

 मैं निजामुद्दीन में कई बार आया था इस बार सोचा कि दरगाह पर जाकर आऊंगा।
 यहां पर दो दरगाह है, एक निजामुद्दीन और एक अमीर खुसरो की। दोनों के बारे में कुछ जानकारी नीचे है

 हज़रत निजामुद्दीन (1235-1325) एक सूफी संत थे। उनका जन्म बदायूं,  यूपी में हुआ। वो बाबा फरीद जी के चेले बने। उन्होंने आध्यात्मिक ऊंँचाइयां हासिल की। ग्यासपुर दिल्ली के पास उन्होंने एक जगह  " खंकाह"  बनाई, यहां पर सभी को खाना खिलाया जाता था ।

अमीर खुसरो (1262-1324),  निजामुद्दीन के शागिर्द थे। अमीर खुसरो का पूरा नाम अब्दुल हसन यमीनुद्दीन अमीर खुसरो था ।
 एक कवि ,शायर ,गायक, संगीतकार थे। उन्होंने कव्वाली की शुरुआत की। कव्वाली के बारे में यह कहा जाता है कि वह परमात्मा को अपनी प्रेयसी मानते हैं और उसको दूर होने की वजह से उसकी जुदाई को अलग-अलग हिस्सों में वर्णन करते हैं।



 कव्वाली भारतीय उपमहाद्वीप में  सूफीवाद और सूफी परंपरा के अंतर्गत भक्ति की एक धारा के रूप में उभर कर आई। इसका इतिहास 700 साल से भी ज्यादा पुराना है। वर्तमान में यह भारत  , पाकिस्तान  एवं बंगलादेश सहित बहुत से अन्य देशों में संगीत की एक लोकप्रिय विधा है। क़व्वाली को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलवाने का श्रेय उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान को जाता है।

 कव्वाली का जिक्र हुआ है तो नुसरत फतेह अली खान (1948-1997) के नाम के बगैर अधूरा है। मात्र 48 साल इस धरती पर रहने के बाद कव्वाली को पूरी दुनिया तक पहुंचा दिया। उनकी कव्वाली पर वे लोग भी नाचते थे जो कि कव्वाली की भाषा को नहीं समझते थे। वो इस तरह गाते थे के सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था। उनको
 "शहंशाह ए कव्वाली" के नाम से भी जाना जाता है।

 कव्वाली में मिलने, बिछुड़ने का अद्भुत संगम है। उसमें अरबी ,फारसी हिंदी, उर्दू , शब्दों का इस्तेमाल होता है । उसकी अपनी ही सुर ताल होती है, जो कि तालियों से की जाती है।
मिर्ज़ा गालिब, अमीर खुसरो इतने दीवाने थे तो उन्होंने लिखा

"गालिब मेरे कलम में क्यों कर मजा ना हो
पीता हूं धोकर खुसरो ए शरीन के पांव में "

अमीर खुसरो ने खड़ी बोली की शुरुआत की जिसको बृज भाषा या खड़ी बोली भी कहते हैं।

 अमीर खुसरो के कुछ दोहे यहां पेश कर रहा हूं

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग॥

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार॥

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 ट्रेन आने में अभी 3 घंटे थे। मैनें आटो पकड़ा निजामुद्दीन दरगाह  के लिए। दरगाह की उस गली के बाहर तक फूलों की महक आ रही थी।  मुझे एक पंजाबी लोक बोली की याद आ गई,
"जित्थे इतरां दी बसे खुशबो
 उत्थे मेरा यार वसदा"

 इस का मतलब यह है कि, यहां पर इत्र की खुशबू रहती है वहां मेरा यार, मेरा महबूब रहता है।

 वहां से प्रसाद, फूल और अगरबत्ती खरीदी। अपना सामान छोड़कर मैं दरग़ाह की तरफ निकल गया । गली में आगे से आगे बढ़ता गया, सब बोलते रहे,भाई जान आगे और आगे।  निजामुद्दीन औलिया की दरगाह यहां पर रॉकस्टार फिल्म की कव्वाली "फाया कू " की शूटिंग हुई है। (ये कव्वाली मेरे दिल के बेहद करीब है)
 फिल्म "दिल्ली 6" की कव्वाली "अरजि़याँ"  की शूटिंग भी यही हुई है।
यँहा हर शुक्रवार को कव्वाली होती है
दूसरी दरगाह अमीर खुसरो की भी है जिन्होंने कव्वाली की शुरुआत की थी। कव्वाली तो मैं बहुत सुनता हूँ। कव्वाली सुनने से अलग सा  नशा आ जाता है । अंदर जो दरगाह है दोनों पर माथा टेका अगरबत्ती या लगाएं और फिर वापसी हो गई। निजामुद्दीन से लिए  ट्रेन भी पकड़ ली थी।

दिल्ली से मैंने ट्रेन पकड़ी  पुणे के लिए। उससे पहले दो मैगजीन "अहा जिंदगी "और "ओशो टाइम्स" खरीदे। यात्रा शुरू हो गई दिल्ली से पुणे की । पास बैठी फैमिली उनके साथ बातें होने लगी । हर कोई अपनी अपनी जिंदगी के किस्से सुनाने लगा। बातें होती पर राजनीति पर कोई बात आती है मैं विषय को बदल देता , क्योकिं राजनीति बहुत ही घटिया विचारों में लिप्त हो चुकी है।  इससे अच्छा है आपको जिंदगी में कोई  प्रकृति,  संगीत, कहानी, कविता के बारे में बात करें। अगले दिन सुबह मैं  पुणे पहुंच गया। वहां जाते  नैशनल  होटल पहुंच गया। मैनें देखा कि लड़के सुबह 7:00 बजे चाय पी रहे थे। उन्होंने मुझे चाय पीने को दी।  हम तो वैसे ही चाय के शौकीन। आदमी होटल बुक किया और निकल लिए ओशो आश्रम ।

Sunday, April 14, 2019

अष्टमी पर लड़कियों की पूजा और पढ़ाई

कल अष्टमी थी तो कंजको को को घर पर बुलाकर उनकी पूजा की।
यहां पर यह बताना जरूरी है कि उत्तर भारत और भारत के कई देशों में नवरात्रों का त्यौहार मनाया जाता है, जिसमें की मां दुर्गा की पूजा होती है, व्रत रखे जाते हैं। व्रत में लहसुन ,प्याज , गेंहु का आटा आदि का सेवन नहीं किया जाता।
गुजरात में बहुत बड़े पैमाने पे लिए मनाया जाता है ।वहां पर रातों को डांडिया खेला जाता है, कोलकाता में मां दुर्गा की बहुत बड़ी पूजा होती है । जिसमें मां की मूर्तियां बनाई जाती है मिट्टी से रात रात भर को पूजा होती है।
औरत पूजनीय है ,क्योंकि वह जननी है,  माँ है और हमेशा वह पूजनीय ही रहेगी।
मैंने उन लड़कियों से पूछा, कि वो पढ़ती है या नहीं ? उनमें से सिर्फ एक ही बच्ची पढ़ती थी। 7 लड़के और एक लड़की में से सिर्फ एक बच्ची । मुझे खुद पर गुस्सा आया कि मैं उस समाज का हिस्सा हूँ जिसमें लड़कियों की पूजा तो होती है,  पर उन्हें पढाया लिखाया नहीं  जाता।  साल में उनको एक बार पूजना यह काफी नहीं है, हमें इनको को  पढ़ाना चाहिए क्योंकि लड़कियां पढेंगी तो अपने पैरों में खड़ी होंगी।
    हमारे होशियारपुर, पंजाब  में एक  "मानवता  मंदिर "  है उसके बाहर यह लिखा हुआ है दुनिया में हर बच्चा जो आ रहा है हमारी नैतिक जिम्मेवारी है।
ओशो कहते हैं बच्चा पैदा होता  कुछ संभावनाएं लेकर पैदा होता है , वो हिटलर भी बना सकता है और महात्मा बुद्ध भी।  
लड़कियों को पढ़ाना इसलिए भी जरूरी है घर को चलाने में कुछ आर्थिक सहयोग भी कर सकती हैं। इससे उनका मनोबल भी बढ़ता है । बहुत बार देखा गया है कि पति अगर निकम्मा हो, या शराबी हो तो औरत पूरी जिंदगी उसके कदमों में काट देती है क्योंकि उसके पास पैसा कमाने का कोई जरिया नहीं होता कि उसने पढ़ाई नहीं की होती। हमारे भारत के गरीब होने का ये भी एक कारण है। गरीबी के कारण ही आबादी की समस्या है।  क्योंकि हर गरीब आदमी सोचता है कितने जब बच्चा पैदा होगा तो दो हाथ कमाने वाले आएंगे, पर वो ये भूल जाते हैं कि हर पैदा होने वाला बच्चा एक पेट भी लेकर पैदा होता है।
गोपाल दास नीरज गरीबी के बारे में यह कहते हैं भूख आदमी को गद्दार बना देती है।
मैंने उन बच्चियों को पढ़ने के लिए घर  आने को कहा क्योंकि मेरी पत्नी बच्चों को पढा़ती है । जो बच्चे गरीब होते हैं उनसे  नामात्र पैसे ही ले लेती है। पर वो बच्चे बहुत दूर से आए थे,  वह यहां हर रोज नहीं आ सकते थे। तो मैंने उनको कहा , तुम अपने घर के आस-पास में आंगनवाड़ी में पढ़ो ।अगर जरूरत है तो कभी हमारे घर भी आ जाया करो।
यह सब देख कर भी मैं परेशान नहीं हो रहा, क्योंकि मेरे से जो हो सकेगा वह मैं करूंगा और कर भी रहा हूँ। किसी बच्चे को कुछ किताबें नहीं होती तो किताबें, आर्थिक रूप से उनकी मदद करता रहता हूँ। मैं सपने देखता रहता हूँ, सपने बुनता रहता हूँ, क्योंकि सपने देखना हमें जीवन जीने की ललक पैदा करता है, हमें जवान रखता है।
बहुत पुराने गीत की कुछ लाइनें याद आ गई
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से
जब रात का आंचल ढलकेगा
जब अंबर झूम के नाचेगा
जब धरती नग्में गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
#rajneesh_jass
13.04.2019
Rudrarpur
Uttrakhand
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Friday, April 12, 2019

यादें बठिंडा पालिटैक्निक की

सब कुछ वैसे का वैसा ही है
मेरा हॉस्टल वैसा ही है
बस उनमें रहने वाले
सारे के सारे बदल गए हैं
"चल यार बंक मार"
ये कहने वाले बदल गए हैं
बेदी सर की क्लास में
शायरी ही सुनाते थे
तीन पीरियड होते थे
पर एक ही निपटा जाते थे
इक सर तो दारू में डूबे रहते थे
इक लंच टाइम में कपड़े बदल
कार से साईकिल पे होते थे
इक होते थे वर्कशाप में फौजी
इक होते थे हर जगह मनमौजी
हर वक्त बेपरवाही में रहना
अब उसे "लापरवाही" कहने लग गए हैं

वह नाका का था प्रोडक्शन वाला
कोई और बैठे तो बने भूत का साला
बंक लगा के नदी में नहाते
बस ना मिलती तो बैलगाड़ी पर आते
बिना टिकट सफर करने वाले
सारे के सारे बदल गए हैं

हॉस्टल वाली मैस वो परांठे याद है
अमूल की टिक्की के साथ दूध गलास याद है डीडीएलजी के सात-सात शो
हॉस्टल के आखिरी दिन दारु पीके दिए थे रो
वह देर रात तक जागकर बातें करनी
बेसिर पैर की वह सौगातें  करनी
अब 10 बजे सुबह अलार्म लगा कर
सब के सब बदल गए हैं

कभी मुज़ाहरे, कभी लाठीचार्ज
सब कुछ सब तो आता है याद
बठिंडे वाला किला भी नहीं भूले
लाल सूट वाली के थे सौ सौ ठुमके
सिनेमा में सीटी बजाने वाले
अब कोक लेकर टहल रहे हैं

बेदी, सत्तू अमरीका बैठे
नवतेज बैठा आस्ट्रेलिया
हुन कोई बोली ना सुनावे
"क्यों उदास बैठा है बेलिया की होया जे वर्ल्ड कप हार गया ऑस्ट्रेलिया"
उल्टे सीधे हाई-फाई शेर बनाने वाले
अब तो सारे बदल गए हैं

फिर भी साल में एक बार मिलते हैं
पुराने सारे यार मिलते हैं
हाथ में जब लाल परी होती है
तो यारों के यार मिलते हैं
अंदर से वही हरकतें हैं
बाहर से चाहे बदल गए हैं

# रजनीश जस
रूद्रपर
उत्तराखंड
12.04.2019
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Wednesday, April 3, 2019

Holi in Chandigarh and Journey to Amritsar

20.03.2019 To 24.03.2019
इस बार होली पर जाना हुआ पंजाब। पिछले कई सालों से उत्तराखंड में हूंँ और हर साल उत्तराखंड में बैठकी होली में जाना होता रहा है।बैठकी होली लोग इकट्ठे बैठकर उत्तराखंड के लोकगीत गाते हैं। हाथों से बने हुए आलू के चिप्स ,आलू के गुटके , भांग की चटनी, घर की बनी हुई गुजिया , यह सब चलता रहता है। एक थाली में अलग-अलग तरीके के गुलाल रखे जाते हैं। आने जाने वालों के गानों के ऊपर गुलाल लगाए जाते हैं और गीत गाए जाते हैं। तो हम निकले फिर पंजाब को । ससुराल डेराबस्सी वहां से गाड़ी में बैठे मैं कपिल मे कपिल की पत्नी चेतना और मेरी पत्नी सिमरन ।पहले पहुंचे अश्विनी के घर पर वहां से गुलाल लगाया। अश्वनी मेरा 20 साल पुराना दोस्त है। हम इकट्ठे पॉलिटेक्निक बठिंडा में पढ़ें हैं। उनके घर जूस पीया, नमकीन खाया , बातें की और फिर वहां से चल दिए। चंडीगढ़ में भी खूब होली मनाई जाती है । मैंने रास्ते में देखा एक सफेद कार, जिस पर होली के कच्चे रंगों से श्रृंगार कर रखा था, जिससे वो कार बहुत ही सुंदर का लग रही थी । एक और ब्लैक कलर की कार देखी जिस पर हाथ के पंजे से कच्चे रंग लगा रखे थे । अब पहुँचे नयागांव, मुन्नी के घर। वो पंजाबी गानों पर अपनी सहेलियों के साथ डांस कर रही थी ।उसने फिर हमें कांजी, जो गाजरों से बनती है । कांजी बनाने की विधि इसके लिए चार लाल गाजर, चार काली गाजरें, चार आंवले, सभी को काट लें। 2 लीटर पानी के अंदर डालते हैं। उसमें 2 चमचे राई, एक चम्मच काला नमक और दो चम्मच सफेद नमक। यह सारा कुछ घड़े में डाल कर रखें। उसके ऊपर उसको कपड़े से बंद कर दें। होली के दिनों में लगभग मार्च में यह दो-तीन दिन में तैयार हो जाती है। पीने में बहुत पौष्टिक होती है।मैंने ये दूसरी बार पी। फिर एक गाना बजाया "जद निकले पटोला बनके मित्रा दी जान ते बनी" पर डांस किया, खाना खाया और फिर वापस आ गए हो चलो अपनी साली शालु के घर। खूब मस्ती की पकोड़े खाए ,चाय पी और फिर वापसी हो गई डेरा बस्सी । उसने छत्त पर बहुत सुंदर फूल लगा रखे हैं। सांढु मिथिलेश आंखों के हस्पताल में हैं। अगले दिन में ट्रेन पकड़ के अमृतसर पहुंचा। रेलवे स्टेशन पर उतरा तो बहुत खूबसूरत नजारा था। यूं तो अमृतसर मशहूर है अपने हरमंदिर साहब के लिए, यहां के पापड़ ,मूंग की दाल की बड़ियाँ , गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी , अमृतसरी कुल्चा, वाघा बॉर्डर पर होती परेड ।यहीं से पाकिस्तान में ननकाना साहिब जाने के लिए ट्रेन है। मैं रेलवे स्टेशन से बाहर निकला तो वही तांबे के बर्तन वाला वही ढाबा दिखाई दिया यहां मैं 2 साल पहले आया था। वहां से ऑटो पकड़ कर नाटशाला पहुंचा । वँहा एक साइकिल की दुकान वालों ने अपने टूलज़ बहुत बढ़िया ढंग से सजा रखे थे। उसकी तस्वीर भी खींची और आपसे शेयर कर रहा हूँ। फिर पहुंचा अपनी सिस्टर के घर यहां मेरे पिताजी और मेरे माता जी उनके साथ ही रह रहे हैं। पिताजी के साथ दोस्ताना संबंध है ,हम दोनों पढ़ने वाले, लिटरेचर की बात करने वाले हैं। जिंदगी के बहुत सारे पहलुओं पर बात हुई ।रात को सो गया और अगले दिन सुबह खाना खाने के बाद के साथ बहुत बढ़िया है मन्चप्रीत मेरे जीजाजी एक डायरेक्टर है, एक एक्टिंग स्कूल भी है जो लोगों को एक्टिंग करने सिखाते हैं। उनके सिखाए हुए बच्चे मुंबई में बहुत नाम कमा रहे हैं। फिर मैं निकल गया खालसा कॉलेज अमृतसर देखने अंदर जाने के लिए परमिशन ली । गेट से ही फुलवारी शुरू हो जाती है यह कॉलेज 1892 में चीफ ख़ालसा दीवान और सिख मूवमैंट ने बनवाया था । कॉलेज की बिल्डिंग का नक्शा भाई राम सिंह ने डिजाइन किया है ।यह कॉलेज ब्रिटिश मुगल और सिख इतिहास की बिल्डिंग के मद्देनजर रखते हुए बनाया गया है। महाराजा, नवाबों और लोगों से चंदा इक्ट्ठा किया गया। एक महल की तरह है पर है यह कॉलेज कमरों की ऊंचाई इतनी है कि कहते हैं कि सर्दियों में यह कमरे कर्म होते और गर्मियों में ठंडा। फोटो खींचने की मनाही थी तो कोई फोटोग्राफ नहीं खींची। पीछे एक गुरुद्वारा बना हुआ है और उसके साथ सिख इतिहास की बड़ी लाइब्रेरी है ।घूमता हुआ पहली वाली बिल्डिंग में आया वहां पर प्रिंसिपल सर का ऑफिस है। उसके साथ में इस कॉलेज से जुड़े लेखक, कवि, एकटर सबकी तस्वीरें लगी हुई हैं। यह 300 एकड़ में फैला हुआ है। अंदर ही खेती होती है ।4 अप्रैल को यूथ फेस्टिवल है यहां पर मैंने देखा और कुछ लड़के भांगड़े की तैयारी कर रहे थे ।गेट से सीधे जाते बाई तरफ वहां पर एक बहुत ही बड़ा बरगद का पेड़ है शायद 100 साल पुराना होगा। हमारे पंजाब के लड़के बहुत ही सुंदर पगड़ी बांधते हैं ,लड़कियां पंजाबी सूट पहनती हैं उन्हें देखकर अपने कॉलेज के दिन याद आ गए। बिल्डिंग ऊपर प्लसतर नहीं है, पर लाल और सफेद कलर की सफेदी ऐसे हैं कि क्या कहें? अमृतसर खालसा कॉलेज के सामने अमृतसर लाहौर रोड पर पंजाब नाटशाला है । अमेरिका के इंडस्ट्रीज ने बना रखी है जिन्होंने अपनी फैक्ट्री को ये रूप दिया है ।उन्होंने इसमें रिवाल्विंग स्टेज वाला ,लगभग डेढ़ सौ सीटों वाला एक थिएटर बना रखा है जिसमें हर शनिवार और रविवार को नाटक होते हैं। इस नाटक की हर सीट की एक टिकट है । लाखों रुपए की लाइट एंड साउंड सिस्टम बहुत ही उम्दा बना है। पिछली बार यहां गया था अमृतसर नाटकों के लिए बहुत ही मशहूर है । पंजाब में नुक्कड़ नाटक खेलने वाले भाई मन्ना सिंह के नाम से मशहूर गुरशरन सिंह यहीं से थे। उनके लगाए हुए पौधे मतलब उनके शिष्य आज पूरे पंजाब में और मुंबई में ओं में नाटक खेल रहे हैं। वहां से फिर मैं अपनी बहन कविता के साथ शहीदों के गुरुद्वारे गया एक गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह । गुरुद्वारे में एंट्री करते ही सबसे पहले अपने जूते जमा करवाएं , हाथ धोए, सिर पर रुमाल बांधा और फिर अंदर चले गए ।वहां पर माथा टेका, लंगर खाया । बाबा दीप सिंह के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने मुगलों के खिलाफ लड़ते हुए उनकी गर्दन अलग हो गई थी तो उन्होंने अपनी ही गर्दन हाथ में उठाकर लड़ते रहे। इस बात को देखकर मुगलों की फौजी घबरा कर भाग गई और उन्होंने फिर अपना शीश हरमंदिर साहिब में चढ़ा दिया ।ऐसे ही बहादुरी की मिसाल इतिहास में और कहीं देखने को नहीं मिलती । सिख कौम जितनी बहादुर है ,उतनी ही दयावान भी है । इन्होने सीरिया में जाके लंगर लगाए, यहां पर लोग जाने से डरते थे । खालसा नाम की एक संस्था है जो पूरे विश्व में कहीं पर भी कोई त्रासदी हो तो वहां पहुंचकर लंगर लगाती है ,घर बनाती है, कपड़े बांटती है । ऐसा ही नेपाल में किया था जब वहां भूचाल आया था, भुज में, उड़ीसा मे, कर्नाटका में यहां जब जम्मू कश्मीर में बाढ़ आई थी, तो यह चीज है हमें अपने बच्चों को बतानी चाहिए, उनको सिखानी चाहिए । मैं भी अपने बच्चों को जब गुरुद्वारे लेकर जाता हूं तो पूछते हैं पापा यहां मुफ्त में रोटी क्यों खिलाई जाती है? तो मैंने उनको बताया उसको रोटी नहीं लंगर कहते हैं । तो मेरे दोनों बेटे वहां कई बार लंगर भी बांटते हैं। घर पहुंचा पिताजी से खूब सारी फिर बातें हुई माताजी से भी और फिर खूब हंसी मजाक चला ।मेरा भतीजा आगाज़ बहुत शरारती है। अपने नाना जी की छड़ी फेंक देता है, रेडियो की आवाज ऊंची कर देता और नाचने लगता है । रात हो गई और सुबह उठा। फिर मैं चल दिया दिल्ली की तरफ यह यात्रा यह समाप्त होती है। अगली यात्रा में आप को लेकर चलता हूं ।





Friday, March 8, 2019

Woman Day

Woman Day
औरतों के बारे में गुरु नानक देव जी जी ने लिखा है
*सो क्यों मंदा आखिए
जित्त जम्मे राजान*
इसका मतलब है कि उसको बुरा क्यों कहे क्योंकि उसने राजाओं को, ऋषि-मुनियों को पैदा किया। कुछ ऋषि-मुनियों ने अपने आप को महान बता दिया और औरत को नर्क का द्वार कहा। हमें इस सोच से ऊपर उठना होगा।
औरत  पैर की जूती नहीं। लोग जो इसको जूती समझते हैं वो  अपनी मांँ का ही निरादर करते हैं जोकि उनको भी जन्म  इक औरत ने ही दिया है  ।
आदमी का काम है पैसा कमाना, परिवार के लिए सुख साधन  इक्ट्ठा करने।  औरत का काम है पैसे का सदुपयोग करना, बच्चों को अच्छे संस्कार देना, मकान को घर बनाना,  वो  घर की छोटी बड़ी सारी चीजें बनाती है ।आदमी परेशान होता है तो वह हमेशा औरत से शांति का आशीर्वाद पाता है। शिव शक्ति का प्रतीक है और पार्वती  माया की।दोनों के मिलन से सृष्टि पैदा होती है चलती है।
तो संसार सिर्फ औरत से, और ना अकेले आदमी से चलेगा।  दोनों को मिलजुल कर जीवन की गाड़ी खींचनी होगी । सुख-दुख इकट्ठे झेलने होंगे, बच्चों को पढ़ाना होगा, नए सपने देखने होंगे, पंख लगाकर आसमान में उड़ने के सपने।

अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे  मुझे 
इश्क के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए 

इश्क है तो इश्क का इज़हार होना चाहिए 
आपको भी चेहरे  से बिमार होना चाहिए 
# मुनव्वर राना


*रिटायर नौकरी से हुए हैं जिंदगी से नहीं*

 कल मेरी पत्नी ऑटो में बैठकर कहीं जा रही थी तो ऑटो में एक लेडीआकर बैठी जो लगभग 60 साल की होगी । पंजाबी सूट, पंजाबी जूती , बहुत बन ठन कर आई थी। बड़ी खुश नजर आ रही थी वो।  

उसने मेरी पत्नी को बताया कि वह पिछले ही साल रिटायर हुई है। 35 साल स्कूल में नौकरी की। जिंदगी की जद्दोजहद में अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी इच्छाओं का कई बार गला घोंटा। बच्चों की पढ़ाई ,कपड़े सिलवाने के लिए, कई बार अपने नए सूट नहीं सिलवा पाई वो। हार श्रंगार करने का मन होता तो वो नहीं कर पाती थी। 

चंडीगढ़ में पली बढ़ी थी और फिर आके रुद्रपुर में रहने लग गई थी । बड़े शहर से आकर छोटे शहर में व्यस्त होना और वहीं पर पूरी जिंदगी बिता देना बहुत बड़ी बात  है।

 उसने बताया कि वह रिटायर होने के बाद 12 लेडीज़ ने मिलकर  किट्टी  डाल रखी है । वह  महीने में  एक बार जरूर मिलती हैं। बहाने से हर महीने नए सूट सिलवा लेती हैं और खूब गपशप करती हैं । एक दिन के लिए रसोई से छुट्टी हो जाती है। 

अपनी जिंदगी के पुराने दिनों को याद करते हुए उसने यह भी बताया कि आज एक औरत घर से रो कर आई थी, शायद उसके पति उसको किट्टी पार्टी में आने नहीं दे रहे थे। वो कहने लगी अभी तो वो रिटायर हो गई , बूढी हो गई है, अब कहां वह भाग जाएगी? जब भागने की उम्र थी तक तो  नहीं भागी। 

 इस औरत ने उसको कहा ,अब पति से डरना छोड़ दे। अपने ढंग से अपनी जिंदगी जी, जो पूरी उम्र नहीं बदला अब क्या बदलेगा? वैसे ही घटियानूसी सोच लेकर  धरती पे आया और ऐसे ही घटियानूसी सोच लेकर इस संसार से विदा हो जाएगा। तू उसके लिए अपनी जिंदगी मत बर्बाद कर । 

उसने बताया कि बच्चे अब बड़े हो गए हैं। जिन बच्चों के लिए विषय में अपनी खुशियां की कुर्बानी दी वह बड़े होकर अपनी पत्नी की बाजू में बाजू डाल कर फिल्म देखने चले जाते हैं और मां-बाप को पूछते भी नहीं मांँ तुम चलोगी क्या? तो यह सब देखते हुए उसने यह फैसला किया कि जिंदगी को अपने ही ढंग से, अपने ही रंग से जीना है ।अब समझौता करने का कोई वक्त नहीं है।

 लड़कियां जो पैदा होती है पहले भाई का डर ,मां बाप का डर,  फिर पति का डर  किसी डर में उनकी सारी जिंदगी बीत जाती है । बहुत कम औरतें होती हैं जिनको की कुछ ऐसी जगह मिले , जिसमें वह पूरा खिल सकें, अपनी पूरी जिंदगी को जी सकें।

 मैं यह किस्सा आपको इसलिए सुना रहा हूं कि हमारी भी पत्नी है,  हमारी बेटी है, वो  कहीं ऐसी ही गुलामी का शिकार ना हो जाए । हम भी उसको पूरा जीने का मौका दें। समय दें, स्थान दे, वह मुस्कुराते हुए जिंदगी जी सकें। 

इतना कहते  हुए वो ऑटो से उतरी । यह सारी बात मेरी पत्नी ने मुझे सुनाई, तो मैंने इस किस्से  को यही नाम दिया कि "हम नौकरी से रिटायर हुए हैं जिंदगी से नहीं।"
 आज के लिए अलविदा, फिर मिलेंगे एक नए किस्से के साथ।


08.03.2019
Rajneesh Jass
Rudrarpur
Uttrakhand

Sunday, March 3, 2019

#journey_ramnagar_uttrakhand

#bajaj_vendor_get_together_2019
टेक्निकल लाइन में  काम  करते हुए आदमी बोर भी हो जाता है। टारगेट, नंबर, प्रोडक्शन, क्वालिटी से कभी रिलेक्स भी होना चाहता है।
बजाज पंतनगर में Customer और Vendor मिलकर एक परिवार की तरह सारी खुशियां मनाते हैं, कोई मुश्किल भी आए तो उससे मिलकर हल करते हैं।
महात्मा गांधी ने  कहा है, Rest is a change of Profession. अगर हम मानसिक काम कर रहे हैं तो हमें शारीररिक  काम करना चाहिए ,अगर हम शारीरिक कर रहे हैं  तो हमें मानसिक काम करना चाहिए।
तो रेस्ट करने के लिए हम  रविवार रामनगर गए। यह सारा Initiative  Mr.  Avinash Kumar, Bajaj Auto Ltd,  Pantnagar, Quality Head की तरफ से हुआ ।
हल्द्वानी कालाढूंगी से होते हुए हमारे राम नगर पहुंचे ।कालाढूंगी में जिम कॉर्बेट म्यूजियम है, जिनके बारे में आगे बता रहा हूँ।  रामनगर की सारे होटल जिम कॉर्बेट के नाम पर है ।यहां पर जंगल सफारी  जिसमें हम खुली जीप में जंगल के अंदर घूमते हैं , जिसमें कि चीते , हाथी, हिरन जंगली जानवर और  पंछी हैं।
तो चलिए मुड़ते हैं रामनगर की यात्रा पर । सड़क के दोनों घने पेड़ और बीच में से निकलती हुई कारें । फरवरी का महीना है तो ठंडक भी हो रही है। हम सुबह लगभग 10:00 के करीब रामनगर होटल पहुंच गये । वहां पर कई लोग पहले पहुंचे हुए थे,   कुछ लोग पीछे आ रहे थे ।
जाते ही कुल्हड़ में चाय पीने का मौका मिला साथ में स्नेक्स थे । एक तरफ कोसी नदी बह रही है  और उसके पीछे पहाड़ हैं जिसकी वीडियो में इस में शेयर करूंगा। उसके साथ 24 एकड़ में बना हुआ यह होटल जिसमें की स्विमिंग पूल, मसाज स्पा, टेबल टेनिस ,घुड़सवारी बच्चों के लिए झूले  हैं। ये फेमिली Get Together बजाज की तरफ से हर साल की जाती है। बजाज कंपनी के 16 वेंडर हैं । उसके क्वालिटी हेड , Second Line और स्टाफ लोग अपनी पत्नी के परिवार के साथ यहां
आते हैं ।
रूटीन से थोड़ा हटके काम।सीमेंट के सोफे,उस पर गद्दे, कुर्सियां लगी हुई थी। उन पर सभी लोग बैठ गए और हम करने लग गए फिर एंकरिंग ।
सभी family को एक-एक करके बुलाया, उन्होंने अपने बारे में जानकारी दी।  किस की लव मैरिज है, किसकी अरेंज मैरिज है?  क्या क्या घर पर होता है?  ऐसे मज़ाक भी चलते रहे। बच्चों ने डाँस किया, देश भक्ति के गाने, चुटकुले, यह महफिल रंग पकड़ती गई ।
मौसम ने कई रंग बदले, कभी धूप - कभी बादल।
उसके बाद हर एक Family Photograh हुई ।फिर हम लोग खाना खाने चले गए। होटल  बढ़िया तरीके से मेंटेन किया हुआ है।
खाना खाकर लौटे तो  मोर की पीहू पीहू सुनाई दी।  गाँव की याद ताज़ा  हो गई।
फिर बच्चों को ड्राइंग के लिए कलर और किताबें दी गई । फिर चली म्यूजिकल चेयर ।
फिर कोई यह कार्यक्रम बड़ा अच्छा लगा जिसको lady एक gent  के कान में फिल्म बता देती है। वह फिर अपने बाकी Gents के सामने इशारों से बताता है कि इस फिल्म का नाम क्या है?  और वह सारे कुछ समय के अंदर बताना होता है।
उसके बाद भांगड़ा हुआ और फिर एक सब की ग्रुप फोटो सारी फैमिली को एक तोहफा प्रेजेंट किया गया। तो  जब उसे खोल कर देखा तो उस में एक कप था, जिस पर सुबह की खींची हुई फोटो प्रिंटेड थी। यह सब आईडिया नीरज शर्मा जी Minda Corporation Quality Head  का था । अच्छा लगा , एक दूसरे से मिलकर, सभी जेंट्स एक दूसरे को जानते थे पर उनकी पत्नी और बच्चे एक दूसरे से मिले और उनको भी एक दूसरे को जानने का मौका मिला ।
ओशो कहते हैं दो शब्द होते हैं , एक Enjoyment और दूसरा Celebration.
Enjoyment है  कि
दूसरा आदमी डांस कर रहा कर रहा है,गीत गा  रहा है और हम उसको बैठकर सुन रहे हैं, देख रहे हैं।  Celebration है खुद नाचना, खुद हंसना। वैसे भी मॉडर्न जिंदगी में यह दो काम हम बहुत कम करते हैं।
असली खुशी भीतर है और हम बाहर ढूंढ रहे हैं।
फिर सभी ने Cat Walk की।
खुलकर हंसी मज़ाक हुआ, वहां पर फिर शाम की चाय कुल्हड़ में भी और फिर वापसी हो गई।
रास्ते कुछ बच्चे अपने हाथों में कुत्ता लेकर खड़े थे उसकी फोटोग्राफ मेरे बेटे ने ली।
#rajneesh_jass
24.02.2019
(sharing information From Google baba)
जेम्स ए. जिम कार्बेट (25 जुलाई 1875 - 19 अप्रैल 1955) आयरिश मूल के भारतीय लेखक व दार्शनिक थे। उन्होंने मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा संरक्षित वनों के आंदोलन का भी प्रारंभ किया। उन्होंने नैनीताल के पास कालाढूंगी में आवास बनाया था। यह स्थान आज भी यहां आने वाले प्रर्यटकों को उस व्यक्ति के जीवन का ज्ञान कराता है जो न केवल एक शिकारी था बल्कि एक संरक्षक, चमड़े का कार्य करने वाला, जंगली जानवरों का फ़ोटो खीचने वाला तथा बढ़ई था। इन्होने उत्तराखण्ड के गढ़वाल जिले मे अनेक आदमखोर बाघों को मारा था जिनमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ भी शामिल था। मगर बाद मे उनके विचार पलटने से और बाघों की घटती संख्या देखकर इन्होने सिर्फ छायाचित्रकारिता ही अपनाई।
जेम्स जिम कॉर्बेट
जिम कॉर्बेट
जन्म
25 जुलाई 1875
नैनीताल, यूनाइटेड प्रोविंस (अब उत्तराखंड), ब्रिटिश भारत (अब भारत)
मृत्यु
अप्रैल 19, 1955 (उम्र 79)
न्येरी, केन्या
राष्ट्रीयता
ब्रिटिश
व्यवसाय
शिकारी, प्रकृतिज्ञ, लेखक
जिम की प्रारम्भिक शिक्षा नैनीताल के ओपनिंग स्कूल से की बाद में सेंट जोसेफ कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नही होने के कारण पढाई बीच में छोड़कर 18 वर्ष की उम्र में मोकामा घाट (बिहार) जाकर वहाँ रेलवे में नौकरी करने लगे।[1]
जिम कार्बेट आजीवन अविवाहित रहे। उन्हीं की तरह उनकी बहन ने भी विवाह नहीं किया। दोनों भाई-बहन सदैव साथ-साथ रहे और एक दूसरे का दु:ख बाँटते रहे।
कुमाऊँ तथा गढ़वाल में जब कोई आदमखोर शेर आ जाता था तो जिम कार्बेट को बुलाया जाता था। जिम कार्बेट वहाँ जाकर सबकी रक्षा कर और आदमखोर शेर को मारकर ही लौटते थे।
जिम कार्बेट एक कुशल शिकारी थे। वे शिकार करनें में यहाँ दक्ष थे, वहीं एक अत्यन्त प्रभावशील लेखक भी थे। शिकार-कथाओं के कुशल लेखकों में जिम कार्बेट का नाम विश्व में अग्रणीय है। उनकी 'भाई इण्डिया' पुस्तक बहुत चर्चित है। भारत-प्रेम उनका इतना अधिक था कि वे उसके यशगान में लग रहते थे। कुमाऊँ और गढ़वाल उन्हें बहुत प्रिय था। ऐसे कुमाऊँ - गढ़वाल के हमदर्द व्यक्ति के नाम पर गढ़वाल-कुमाऊँ की धरती पर स्थापित पार्क का होना उन्हें श्रद्धा के फूल चढ़ाने के ही बराबर है। अत: जिम कार्बेट के नाम पर यह जो पार्क बना है, उससे हमारा राष्ट्र बी गौरान्वित हुआ है, जिम कार्बेट के प्रति यह कुमाऊँ-गढ़वाल और भारत की सच्ची श्रद्धांजलि है। इस लेखक ने भारत का नाम बढ़ाया है। आज विश्व में उनका नाम प्रसिद्ध शिकारी के रूप में आदर से लिया जाता।








Thursday, January 10, 2019

Journey To Ramgarh, Uttrakhand


Journey to  Ramgarh,  Uttrakhand
नए साल पर पूरे विश्व में पार्टियां हो रही हैं। हमारी कंपनी में शटडाउन था। हमें छुट्टियां थी तो हमने भी प्लान बनाया जाने का। रुद्रपुर से 80 किलोमीटर दूर रामगढ़ मुक्तेश्वर के रास्ते में। यहाँ ये बताना जरूरी है कि ये शोले फ़िल्म की शूटिंग हुई थी ।😂😂
  मैं घर से  निकला पंकज और विशाल गाड़ी में बैठ कर मेरा इन्तज़ार कर रहे थे। Jagwinder की कमी महसूस हो रही थी वो नहीं आ पाया क्योंकि उसकी factory working थी ।
चल दिए मुसाफिर पंकज की कार पर सफ़र पे। हल्द्वानी होते हुए, हम काठगोदाम पहुंचे। काठगोदाम से पहाड़ नज़र आते हैं । ऐसा लगता है कि मानो हाथ जोड़ कर नमस्कार कर रहे हों  "कि आइए स्वागत है आपका।"
 भीमताल होते हुए ऊपर पहुंचे तो एक दुकान पर चाय पी, अदरक और काली मिर्च वाली। वहां से कुछ फल फ्रूट लिए। रुद्रपुर से निकलते हैं हमने अमरूद भी लिए थे । सफ़र पर अमरूद  अच्छे रहते हैं।
 2:00 बजे चले तो लगभग 5:00 बजे के करीब हम रामगढ़ पहुंच गए। सूरज छुप गया था यहां पहाड़ी पर। कोहरे से घास पर बर्फ़ दिखाई दे रही थी। पंकज के चाचा ही  बहुत सारे फ्लैट है। वह दिल्ली में यह मकान सेल के लिए लगाए गए हैं। टू बैडरूम सेट रूम हीटर लगाया और कपड़े बदले ।खाने का ऑर्डर दिया बैठ गए गप्पे मारने। ठंड बढ़ गई , उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खाँ की कवाल्लियाँ सुनी। पंकज के  blue tooth वाले speaker बहुत काम आये। Davinder Singh Bedi से अमेरिका  video call की। हमारी दोस्ती  1993 से है वो अमेरिका चला गया। उसकी एक खास चीज़ है कि उसका दिल दायीं तरफ़ है और बहुत बड़ा है। वो हम से लगातार touch में है।
 खाना खाकर हम 10:00 बजे बाहर निकले तो पहाड़ी पर थोड़ा सा ही घूमे थे और फिर हमने सूखी  झाडि़याँ  से आग लगाई, हाथ सेके । आग पर हाथ सेकने का अलग ही मज़ा है। सो गए। रात पंकज को एसिडिटी हो गई लगभग 2:00 बजे। मैनें उसका accupressure किया। अच्छा हुआ हमारे पास एक स्टील की बोतल थी रात को हमने उस्मी गर्म पानी करवा कर रखा था। गर्म ठंडा पानी मिक्स करके पिया तो पंकज को राहत महसूस हुई। हम सो गए। लगभग 4 डिग्री टेंपरेचर होगा।
 सुबह सुबह बाहर निकला देखा तो सामने हिमालय दिखाई दे रहा था। ये देखकर मन आनंदित हो गया। हिमालय बुद्ध पुरुष की तरह अकेला ही खड़ा है बांहे पसारे और भारत को बहुत सारे मौसम प्रदान करता है। फिर हमने फ्रेश होकर खाना खाया और निकल गए।  अरविंदो आश्रम यहां से 10 किलोमीटर था ।
  
जब स्वामी अरविंदो  पॉंडिचेरी में एक अश्रम बनाया यहाँ आज लगभग 5000 सन्यासी  रह रहे हैं और ध्यान कर रहे हैं ।
आदमी की जो परम दशा है वो पूरा खिल जाना है, जिसे हम बुद्ध कहते हैं।

अरविंदो आश्रम भी बहुत बढ़िया जगह बना हुआ है। वहां जाकर पता चला कि वह पूरे साल के लिए मेडिटेशन के लिए बुक है। थोड़ी देर  साइलेंट रुम में बैठकर मैंने मेडिटेशन की। वँहा एक सन्यासी मिला जो 11 साल से वंही है। वो उड़ीसा से था।
कुछ किताबें लीं और फिर हम निकल लिए वापस ।  भीमताल पहुंचे तो एक रेस्टोरेंट में खाना खाया । फिर  हम झील पर गए हमने वहां बोटिंग की।  सामने पहाड़ी पर एक मकान देख रहा था कि बहुत खूबसूरत था।बोट वाले लड़के  ने बताया कि यहां
"कोई मिल गया "
फिल्म की शूटिंग हुई थी। झील के बीच में Fish Aquarium  है उस में अलग-अलग किस्म की मछलियां हैं । बोटिंग करके वापस  शॉपिंग की ओर से हम 4:00 बजे के करीब रुद्रपुर की वापस पहुँच गए।
फिर मिलेंगे एक नए किस्से के साथ।  तब तक के लिए अलविदा ।
#rajneesh_jass
30.12.2018
Rudrapr
Uttrakhand