Monday, September 14, 2020

#journey_to_chail_himachal_pardesh

#journey_to_chail_himachal_pardesh

रविवार है तो साईकलिंग, दोस्त, किस्से, कहानियाँ। आज साईकलिंग पर नहीं गया पर आपको एक यात्रा पर लेकर चलता हूँ, यात्रा है कुफरी और चायल जो शिमला के पास हिमाचल प्रदेश मे है। 

रुद्रपुर से रामपुर पहुँचा। रामपुर से ट्रेन पकड़ी। ट्रेन में साइड वाला अप्पर बर्थ मिला। 

एक आदमी अपनी सीट ढूँढ रहा था, वो अपनी टिकट की फोटो खींचकर लाया था, जिस पर नंबर साफ नहीं दिखाई दे रहा था।मेरे सामने वाली सीट पर एक आदमी था उसका मोबाईल लेकर उसकी मदद कर रहा था।
  किसी कारण वो डिब्बा नहीं था जो उस तस्वीर में दिखाई दे रहा था। उसकी जगह उसकी सीट दूसरे डिब्बे में शिफ्ट हो गयी थी। मुशकिल से उसे सीट मिली। वो उस आदमी का शुक्रिया अदा करके चला गया।
मैं ये सब देख रहा था तो मैंने उस मदद करने वाले से  बात की। उसका नाम शेरखान था और उसका कलकत्ता में ट्रांसपोर्ट का काम था।
 फिर मैं सो गया।  फिर अंबाला आ गया। अंबाला से मैंने दो नंबर प्लेटफार्म से पुराने वाली दुकान से ब्रेड पकौडा खाया। फिर अपने ससुराल डेराबस्सी सुबह 4 बजे पहुँचा। वँहा जाकर आराम किया  नहाया धोया और निकल लिया चंडीगढ़ की तरफ। मेरा एक दोस्त बाहर से आया हुआ था हम हर साल Get Together करते हैं। जिसमें दो रात  होटल में रहते हैं, पुरानी कालेज की बातें करते है, खूब हँसते हैं, मस्ती करते हैं।
हम सभी 1993 - 96 में सरकारी पालीटैक्निक कालेज बठिंडा में इक्ट्ठे पढे हैं।
उनहोने  मुझे 10:30 बजे गोपाल स्वीटस पर मिलने को कहा।  तब तक मैं भी पंजाब युनीवर्सिटी चंडीगढ़ चला गया क्योंकि मेरी पहली पंजाबी कहानियों की किताब " अन्जान टापू" रिलीज होनी थी। उस किताब के इस समारोह में में  मुझे देरी हो गई, उधर से विवेक पाठक के फोन पर फोन आ रहे थे। ये किताब पंजाबी के जाने माने लेखक जंग बहादुर गोयल जी के हाथों हुआ।
मैनें अपने बाहर से आए दोस्त के लिए एक किताब खरीदी और अपने लिए कुछ किताबें भी।
 दोस्तों के बाद फोन आए, मैं गोयल जी के साथ ही वँहा से निकला। मैं जैसे ही वापस आया  मेरा दोस्त जो बाहरले मुल्क से आया हुआ था उसे ज़रूरी काम आ गया के वहीं से लौट गया। हमारा दिल उदास हो गया। अब हम कुछ दोस्त विवेक पाठक, जगमीत, जगविंदर, प्रशांत शर्मा  निकल लिए शिमला की तरफ। रास्ते में  थोड़ी भूख लग गई। तो प्रशांत शर्मा  अपने घर से मक्की की रोटी, सरसों का साग और आम का अचार लाया हुआ था। हमने वही सड़क पर एक तरफ गाड़ियां लगाई और वहां खाना शुरु कर दिया। फिर वहां से पिंजोर पहुंचे। पिंजोर से एक तरफ को बाईपास निकलता है क्योंकि कालका जी ने सड़क बहुत टाइट होने के कारण जाम लग जा रहा था तभी  सरकार ने  बाईपास बना दिया था। वहां से शिमला की तरफ रूख कर लिया। रास्ते में खाते पीते गए । कभी छोले भटूरे, कभी संतरे। हमने एक दुकान में चाय पी, वो दो सिख भाईयों की थी। उन्होनें बहुत बडा कुत्ता पाला हुआ था।

 रास्ते में सोलन आया वहां पर" सोलन नंबर वन" के मशहूर स्काच व्हिस्की बनाई जाती है। इसे अंग्रेजी राज में 1842 मे एडवर्ड अब्राहम डायर ने बनाया था। वो जलियांवाला बाग में 1913 के गोली चलाने वाले जनरल अडवायर के पिता थे। ये ब्रांड बहुत मशहूर है। अब ये फैक्ट्री मोहन मेकन के नाम से चल रही है।

हम पहाड़ियों का नजारा लेते हुए चैल की तरफ बढ़ रहे थे। धीरे धीरे सूरज महाराज नीचे आने लगे और अंधेरा बढ़ने लगा। हम रास्ते में एक खाई में गाडियां लेकर उतरे,  वहां पर पानी बह रहा था। पानी में लकड़ी की कुर्सियाँ टेबल  लगे हुए थे।  सामने लकडी और स्लेट की हट बनी हुई थी। हमने वहां पर पकौडे बनवाकर खाए। और आगे बढ़  दिये। अंधेरा बहुत हो चुका था । हमने होटल वालों को फोन कर दिया। हमारा बाहर वाला दोस्त नहीं आया था तो प्रोग्राम में कुछ चेंज हो गया था । 

 चायल के बारे में एक और दिलचस्प जानकारी है कि वहां पर दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान है, ये महाराजा पटियाला ने बनाया था। यहां पर उनका एक महल भी है जिसको अजायबघर में तब्दील कर दिया गया है इसको लोग टिकट खरीद कर देखने जाते हैं।

जैसे ही हम वँहा चायल होटल पहुँचे हमारा स्वागत किया गया। पहाड़ी टोपी डाली, गले में हार डाले गये। वँहा पर ढोल वाला आया हुआ था,उसने ढोल बजाया और हमने डाँस किया। 
 हमने अपने एक दोस्त को कह दिया कि तुम कहना मैं बाहरले देश से  आया हुआ हूँ,बस फिर क्या जो वहां पहुंचे जैसे ही कोई वेटर आया करे वह 100 और 500 का नोट निकाल कर उसको टिप दे देता।

फिर हमने होटल में चैक इन किया। हमने बाहर ही उसको बोन फायर और संगीत लाने को कहा। बाहर तापमान 2 डिग्री था । सामने पहाड़ियों पर घर जुगनू की तरह चमक रहे थे। फरवरी में वैसे भी उत्तर भारत में बहुत ठंड होती है। खुले आकाश का अलग ही नजारा था। हमने वहां पर खाना खाया फिर हम सो गए। फिर हम सुबह उठे और सुबह का नाश्ता खाया और गाड़ियों से निकल गए हम कुफरी की तरफ। रास्ते में पहाड़ियों पर बर्फ गिरी हुई थी, हम उसका आनंद लेते हुए जा रहे थे।
 मुझे रोजा फिल्म का गाना याद आ गया

 ये हसीं वादियां
 ये खुला आसमा
 आ गए हम कहां

हम कुफरी पहुँच गये। वँहा कपडा  मार्केट में रूके। वँहा पर बर्फ ही बर्फ जमी हुई थी। चलने पर फिसल रहे थे। हमने वँहा चाय पी। कुछ दोस्तों ने एक दूसरे पर बर्फ डालकर शरारतें कीं। साथ में चिड़ियाघर था। हमने टिकटें खरीदी और अंदर चले गए । वँहा पेडों पर बर्फ ही बर्फ थी और नीचे भी। चलते हुए कई बार हमारे पैर बर्फ में घुस गए। अंदर बहुत सारे जानवर थे  जैसे हिरण, बारहसिंघा और चीता। रास्ते में बर्फ हटाकर रास्ता साफ करते हुए हमें मज़दूर भाई बहन मिलें। मैंने उनसे बातें की और उनकी फोटोग्राफ खींची। मैंने उनका शुक्रिया अदा भी किया क्योंकि वह बर्फ को बेलचे से एक तरफ हटाकर हमें फिसलने से बचाने का काम कर रहे थे।  हम आगे गए तो एक पिंजरे में एक चीता दिखाई दिया। पता चला कि वह काफी साल पहले यँहा लाया गया था जब वो छोटा सा बच्चा था। जानवरों को पिंजरे में देखकर मुझे ये महसूस हो रहा था कि हम अपनी मनोरंजन  की खातिर कितने सारे जानवरों को पकड़कर उनकी आजादी खत्म कर दे रहे हैं। अगर इससे उल्ट हो, कि अगर हम पिंजरे में हों और वो जानवर बाहर हो तो जैसे कि कोरोना काल में हमने देखा ही है।
वँहा से वापिस निकले हम चायल के लिए। 

चायल का भी अपना एक इतिहास है। महाराजा पटियाला ने बनवाया हुआ ये कस्बा है क्योंकि शिमला के माल रोड पर अंग्रेजों ने  लिखकर लगा रखा था, भारतीय लोग इस पर नहीं आ सकते। ये बात उन्हें खल गयी और इस जगह को बसाया गया।

 कुफरी से आते हुए हम होटल नहीं बल्कि पहाड़ की चोटी पर बना काली माता का मंदिर माथा टेकने गये। यह मंदिर सफेद  संगमरमर  से बना हुआ है। वह फर्श इतना ठंडा था कि नंगे पैर ठंड से जमने को हो रहे थे। हमने वहां पर माथा टेका वापिस होटल आ गये।

 हमारा होटल पहाड़ी के ढलान पर था। उसमें खिड़की की जगह पूरा शीशा लगा हुआ था, सामने बहुत खूबसूरत नजारा दिखाई दे रहा था।
हमने सुबह का उगता सूरज देखा, रात को पहाड़ पर लाईटें। हमारे देश में बहुत सारी जगह अच्छी जगह है वँहा घूमने के बजाए हम  बाहर के देशों को भागते हैं।

 हमने फिर रात को खाना खाया और देर रात तक खूब गप्पे मारी। होस्टल के दिनों के पुराने नाम लेकर खूब को याद किया।
 सुबह 4 बजे हम निकलें।
गूगल मैप से रास्ता देखने लगे, पर हम गल्त रास्ते पर आ गये। वँहा बिल्कुल अंधेरा था। फिर एक जगह बस वाले से रास्ता पूछा। जब हम राह पर आ रहे थे तो रास्ते में तीतर और कई खूबसूरत पंछी दिखाई दिए। राह में एक पैदल मुसाफिर मिला। हमने उस से रास्ता पूछा और उसे कार में लिफ्ट लेने को कहा पर उसने मना कर दिया। वो अपनी मस्ती में चल रहा था।
रास्ते में सूखे पेड़ दिखाई दे रहे थे। ये सेब के पेड़ थे, ये मुझे रामगढ़, उत्तराखंड जाते हुए बातूनी ड्राईवर ने बताया था।

सेब के बारे में दिलचस्प जानकारी

करीब 111 साल पहले 1905 में अमेरिका से एक युवक हिमाचल आया। सैम्युल इवांस स्टोक्स ने शिमला के लोगों को बीमारी और रोजी-रोटी से जूझते देखा तो यहीं बसकर उनकी सेवा करने का निर्णय लिया। वे स्थानीय युवती से शादी कर आर्य समाजी बन गए।

अपना नाम सत्यानंद स्टोक्स रख लिया। इस क्षेत्र में नकदी फसलें नहीं होने से लोग काफी गरीब थे। इसी बीच, इस युवक ने साल 1916 में अमेरिका से पौध लाकर कोटगढ़ की थानाधार पंचायत के बारूबाग में सेब का पहला बगीचा तैयार किया।
लोगों को सेब उगाकर दिखाया और उन्हें भी प्रेरित किया। सौ साल बाद आज हिमाचल एप्पल स्टेट बन चुका है। यहां के बागवान करोड़पति बन चुके हैं। प्रदेश के लाखों परिवार दूसरा काम धंधा छोड़कर सेब बागवानी से मोटी कमाई कर रहे हैं।

शिमला, कुल्लू, किन्नौर, मंडी समेत 12 में से 8-9 जिलों में सेब उत्पादन हो रहा है। आज उनकी लगाई रॉयल वैरायटी का सेब विदेशी किस्मों को भी मात दे रहा है। मौजूदा समय में हिमाचल में सेब का सालाना 3 हजार करोड़ रुपये का कारोबार होता है।

गौरतलब है कि सत्यानंद स्टोक्स ने स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ भी रहे। वे खादी पहनते थे। उनकी बहू विद्या स्टोक्स मौजूदा समय में हिमाचल सरकार में बागवानी मंत्री हैं। 

कुल बागवानी क्षेत्र : 2,28,000 हेक्टेयर
सेब के तहत क्षेत्र : 1,09,553 हेक्टेयर
सालाना पैदावार : पांच से आठ लाख मीट्रिक टन
बागवानों की संख्या : करीब 9 लाख।
फलों से प्रति व्यक्ति आय (2014-2015) : 5525 रुपये

प्रदेश में प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्र
शिमला जिले के कोटगढ़, कोटखाई, रोहडू़, चौपाल, कुल्लू जिला, किन्नौर जिला, लाहौल स्पीति, चंबा, मंडी जिले के कुछ इलाके, सिरमौर जिले के नौहराधार, हरिपुरधार क्षेत्र, कांगड़ा के बड़ा भंगाल, छोटा भंगाल क्षेत्र। 40 डिग्री तापमान में उगने वाला सेब बिलासपुर जैसे कुछ अन्य जिलों में उगाया जा रहा है।

 यहां पहली बार सेब पौधे लाए थे। आज अगर हिमाचल सेब राज्य है तो पहला पौधा उनका ही लगाया हुआ है। 
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 रास्ते में हमने एक जगह कभी मैगी खाई। पहाड़ी रास्तों से मैगी खाने का लगी मजा ही कुछ और होता है। उसके बाद एक दुकान पर रुक कर बाँस का आचार खरीदा  और फिर हम चंडीगढ़ आ गए।
आज के लिए इतना ही। फिर मिलूंगा एक नया किस्सा लेकर।
आपका अपना
रजनीश जस
रूद्रपुर
उत्तराखंड
निवासी पुरहीरां 
होशियारपुर
पंजाब
#chail
#himachal_pardesh
#kufri
Feb.2020

Sunday, September 13, 2020

Sunday Diaries 13.09.2020

रविवार है तो साइकिलिंग, दोस्त, किस्से कहानियाँ। सुबह उठा, सेब खाया और निकल लिया साईकलिंग पर। चाय की अड्डे के आगे से निकला था तो वँहा खूब रौनक थी। स्टेडियम के आगे से होता हुआ एक बड़ा गोल चक्कर घूम कर साइकिल चलाते हुए पार किया। वहां पर लड़के लड़कियां एक्सरसाईज़ कर रहे थे और  सेल्फी खींच रहे थे, छोटे बच्चे साइकिल चला रहे थे। मैनें फोटोग्राफी की और वापस चाय के अड्डे पर आ गया। 


वहां पर डॉ प्रदीप जायसवाल मिले अपने एक ओर डाक्टर के साथ। हम बातें करने लगे।  एक लड़का ओर आ गया वह एक आर्ट टीचर है।  महात्मा बुद्ध के बारे में बातें हुई तो प्रदीप जी ने बताया कि यहां पर महात्मा बुद्ध ने आखिरी सांस ली थी कुशीनगर में  वो उनके घर के पास है।

 मैं सुना रहा था कि महात्मा बुद्ध को किसी गरीब आदमी ने अपने घर पर खाने के लिए बुलाया। कुछ और ना मिला तो वो जंगल से  कुकरमुत्ता (मशरूम) तोड़ कर लाया और खाना बुद्ध को परोसा। जैसे ही बुद्ध ने भोजन चखा उनको पता चला है यह ज़हरीला है। पर वह आदमी इतनी प्यार और श्रद्धा से खाना खिला रहा था कि बुद्ध में वह खाना खा लिया। उनके शरीर में जहर फैलने लगा। वो अपने आश्रम में आए और उन्होंने कहा कि आज से 3 दिन बाद मैं  ये शरीर त्याग दूंगा।  मेरे लिए वह दोनों लोग पूजनीय है जिसने मुझे पहला खाना खिलाया और इसमें मुझे अंतिम। क्योंकि वह जानते थे कि जब उनके भिक्षुओं को पता चलेगा इस आदमी ने ज़हरीला  कुकरमुत्ता खिलाया है तो  भिक्षु उसको पीट-पीटकर मार देंगे । इसलिए बुद्ध ने कहा कि जिसने मुझे अंतिम खाना खिलाया है वह भी मेरे लिए पूजनीय है।

 इसके बाद जैसवाल जी ने बताया उनकी सारी परवरिश बेंगलुरु में ही हुई है। एलकेजी से लेकर डेंटिस्ट बनने तक का सफर उन्होनें  वहीं पर किया । फिर उनके भाई की नौकरी रुद्रपुर लग गई ।  वह लोग  2007 में यहां आ गए । यहां आने के बाद उन्होंने देखा कि यँहा हल्द्वानी से पहाड़ शुरू हो जाते हैं और उत्तराखंड बहुत खूबसूरत और हरा भरा है। उनको लगा कि यँही रह जाऊं तब से यहीं रुक गए। जब कभी कुछ कमी महसूस होती है तो वो हल्द्वानी के पास हेड़ा खान चले जाते हैं। मैं कभी गया तो नहीं पर उसकी जगह के बारे में बहुत सुना है। नदी के किनारे लोग पत्थर से चुल्हा बनाकर  चावल बना लेते हैं , कुछ लोग चिकन लेकर जाते हैं कुछ लोग ड्रिंक लेकर जाते हैं और वहां पर पिकनिक मनाने मनाते हैं ।
वो बता रहे थे जब वहां गए तो बहुत सारे ड्रिंक पीने को मिले जैसे जिंजर ड्रिंक, लेमन ड्रिंक वो भी  कुनकुना पानी में।
  मैंने उनको भी दिखाया जिसकी तस्वीर में शेयर भी कर रहा हूं मैंने कहा एक पत्ता ऐसा है जैसे कि कुदरत है नाक्काशी की है,  एक पत्ता सूख गया है वह बूढ़ा हो गया है और वह दोनों मिट्टी पर बैठे हैं। मतलब की मिट्टी से पैदा हुए हैं और से और फिर मिट्टी में ही मिल जाएंगे । ऐसा ही आदमी का एक सफर है वो 5 तत्व से बनता है, बच्चा बनकर पैदा होता है,जवान होता है, जीवन के सुख दुख की धूप छाया  भोगता है, बुढ्ढा होता है, फिर 5 तत्व  में लीन हो जाता है। सारी चीजें वर्तुल में घूमती हैं।

 हम वहां बैठे थे तो हम में से एक का मोबाइल नीचे गिर गया था , वहीं पर दर्द का तेल बेचने वाले ने बता दिया।
वँहा पर  एक पागल आदमी भी घूम रहा था।  चाय वाले उसको चाय पीने को दी। यह दोनों बातें  इंसानियत है। मैं ये सोच रहा था कि दुनिया में पागल है, भुखमरी है तो कहीं ना कहीं हम सब भी इसके जिम्मेवार हैं। भारत का जब 1947 में बटवारा हुआ था तो लगभग 50 करोड़ की आबादी थी जो कि 70 साल में 130 करोड़ हो चुकी है। इतनी आबादी है जिसके कारण देश में में देश में भुखमरी, बेरोजगारी इत्यादी बढ़ रहे हैं।

 हम जब कुछ सोचते हैं तो वो  हमारे शरीर से वाइब्रेशन बनकर निकलती हैं जब वो वाइब्रेशन के दूसरे वाले में से मिलती है तो वोआपकी तरफ खिंचा चला आता है। जैसे आप बस में बैठे हैं , कँही सफर कर रहे हैं तो आपके शौक वाला आदमी अचानक आपके पास आ जाता है और सफर सुखद हो जाता है।
 और बहुत सारी बातें हुई  जैसे कि रविंद्र नाथ टैगोर और आइंस्टाइन का  पत्र व्यवहार चलता था। वह आपस में मिलते भी थे। इसमें क्या है कि जब साइंस और कला जब  मिलती है तो ही समाज का उत्थान होता है। अगर अकेली साइंस तरक्की करती रहेगी तो वो बम बना कर दुनिया को तबाह कर देगी। पर  अगर वहीं  कला के साथ मिल जाती है तू कोमल हो जाती है।
 यह यँही हो रहा था अभी डेंटिस्ट मेरे जैसा ही कवि,पंकज जैसा इंजीनियर और वो आर्ट टीचर।
हम सबका मिलना  सुखद हो, यही दुआ है।

 आइए छोटे बच्चों को परवरिश  बात करते हैं। हमारे बच्चे जब साथ में आठवीं कक्षा में हो जाते हैं तो उनके अंदर एक ऊर्जा का विस्फोट होता है। उस ऊर्जा को अगर सही दिशा में लगा दिया जाए कमाल हो सकता है। जैसे कि बच्चे टीनेजर उसमें कक्षा तक पहुंचे तो उन्हें चाय बनाना, चावल बनाना, सब्जी काटना आना चाहिए, घर में झाड़ू पोछा करना भी।  इससे क्या रहेगा, जब भी वह कहीं आगे कॉलेज में हॉस्टल में जिंदगी जीने के लिए जाएंगे  तो परेशान नहीं होंगे।अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो क्या हो गया हो सकता है  उसका भी पता कर लेते हैं। जब भी कभी मां बीमार होगी तो बच्चे भूखे रहेंगे या होटल से खाना मंगवा लेंगे।

 आखिर में जेन कहानी स्टोरी । एक बार  दो फकीर पहाड़ी के रास्ते चले जा रहे थे। बहुत ज्यादा बारिश थी। एक लड़की ने कहा वो कीचड़ वाला रास्ता  पार नहीं कर सकती। तो एक भिक्षु ने उसे बाहों में उठा लिया और वह जगह पार करा दिया। कीचड़ पार करवाने के बाद भिक्षु ने उसे वहां पर उतार दिया और वो दोनों भिक्षु अपनी राह पर चल दिए। आगे चलकर दूसरे ने पहले भिक्षु कहा,  तुम्हें पता है कि लड़की को हम भिक्षु छू नहीं सकते तुमने लड़की गोदी में क्यों उठाया? पहले भिक्षु ने जवाब दिया मैंने तो उसको कीचड़ पार करके वंही उतार दिया था पर तुम  मानसिक तौर पर उसको अभी भी ढो रहे हो।

जिंदगी में जो पीछे बीत चुका है उसका रोना रोने से अच्छा है जो अभी हो रहा है उसको जिए।

आज के लिए इतना ही। फिर मिलूंगा एक नया किस्सा लेकर। 
आपका अपना 
रजनीश जस
रूद्रपुर
उत्तराखंड 
निवासी पुरहीरां
 होशियारपुर
 पंजाब
13.09.2020
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Thursday, September 10, 2020

Journey to Rock Garden Chadigarh

रविवार है तो साईकलिंग, दोस्त, किस्से कहानियाँ। सुबह उठा भूख लग रही थी तो एक से  सेब खाया और निकल या साइकिलिंग को।
सेब एक अच्छा फल है, मैं जब भी सफर पर जाउँ तो सेब ओर अमरूद साथ रखता हूँ।

 आज धुंध थी, सूरज देवता भी बादलों के पीछे छिपे थे। मैं देख रहा था आज साइकिलिंग करने  बहुत सारे लोग आए हुए थे। कुछ लोग व्यायम कर रहे थे । मैनें कुछ फोटोग्राफ खींचें।
 आज चाय के अड्डे पर भीड़  थी । भीम सिंह  बिष्ट , हमारे चाय के अड्डे के कर्ता धर्ता हैं। लोग उन्हें प्यार से "भीम दा" कहते हैं। जहां पहाड़ में बड़ों के नाम के साथ "दा" लगाया जाता है। बंगाली में बड़े भाई भाई को "ददा" कहा जाता है।

 मैं देख रहा था कि वहां पर ब्रेड के पॉलिथीन पड़े हुए थे । मुझे याद आ गया था कि इस कूडे कर्कट से, कबाड़ से चंडीगढ़ में रॉक गार्डन बना है। रॉक गार्डन चंडीगढ़ में नेक चंद जी द्वारा भी बनाया गया है। मैं कई बार वँहा गया हूँ।
 इसकी भी एक बहुत दिलचस्प कहानी है। नेक चंद जी का जन्म बाडियाँ कलां में हुआ जो कि अब पाकिस्तान में है । 1947 के बटवारे के बाद वो भारत आ गये। फिर पढ़ लिखकर PWD में  रोड इंस्पेक्टर बने। इसके बाद जब चंडीगढ़ बनना शुरू हुआ उनकी  नौकरी चंडीगढ़ लग गई। सुखना लेक के पास उनको सड़क बनाने का कार्य सौंपा गया। वह नौकरी करते रहे। फिर शहर बस गया। 

लोगों ने कबाड़ जंगल में फैंकना शुरू किया। नौकरी करते करते वो अपने कल्पना जगत में रहने लगे। नौकरी करने के बाद फिर शाम को जंगल में चले जाते वहां पर शहर का जो कूड़ा करकट था उससे उन्होंने नगर की स्थापना की।
इसी दौरान उनका एक बेटा जो ढाई साल का था वो एक बार बिमार हो गया, डाक्टर के पास पहुंचते पहुंचते ही उसकी मौत हो गयी। 

 वो फिर निराश ना होकर अपनी सारी ऊर्जा को उस राक गार्डन को बनाने में जुट गये। लगभग 15 साल तक  वो ये कार्य अकेले ही जंगल में करते रहे। ये बात उनके घर वालों को भी नहीं पता थी।
 रात को साइकिल के टायर को जलाकर वो जंगल में रोशनी करते और मच्छरों  बचने के लिए एक बोरी को सिर पर बाँध लेते। पास ही बहती हुई नदी अलग अलग तरह के नायाब पत्थर ढूंढ कर लाते थे जिस पर कोई ना कोई बुत होता।
फिर किसी अधिकारी ने देखा तो इस जगह को आम लोगों के खोल दिया गया और नाम रखा गया राक गार्डन। तब ये 12 एकड़ मे बना हुआ शहर था, अब 40 एकड़ में फैल चुका है।
टिकट खरीद कर जब हम अंदर जाते हैं तो  दरवाजे इस तरह बनाये गये हैं कि आपको झुक कर जाना पड़ता है, ये राजा का सम्मान है। नेक चंद जी ने इसे देवी देवताओं की नगरी का नाम दिया ।
 रानियों का महल के नहाने का हमाम बनाया गया है जो कि उँचाई पर है, वहाँ से रानियाँ नीचे बने दीवाने आम को देख सकती थीं पर उनको कोई नहीं। उँचाई पर राजा का महल है, वँहा एक झरना है।

  दूसरे फेस में  आम लोग बनाए गये है, उनका जन जीवन। कुँआ , यँहा से औरतें  पानी भरती थी। पहाड़ पर आम लोगों के छोटे छोटे मकान बने हैं , जिनकी छत्तें टूटे हुए घडों से बनी हुई है।
 फिर तीसरा फेज। बना है जिसमें डॉल गार्डन है , झूले बने है, फिश अक्येरम है,  ऐसे शीशे हैं कि उनमें देखने से हमारा चेहरा लंबा दिखाई देता है जिसे देखकर हँसी आती है।  सूखे हुए सीमेंट की बोरियों से उँची ऊँची दीवारें बनी हुई हैं।

इसमें  टूटे हुए चीनी के बर्तन, टूटी हुई चूडियाँ इत्यादि का इस्तेमाल किया गया है। इसी के लिए 1984 में पद्मश्री से नवाजा गया और दुनिया भर में लोगों को कूडे से ऐसी कलाक्रतियाँ बनाने के लिए भी गये। 

 सारी यदि दुनिया भर में बहुत सारा कूड़ा पैदा हो रहा है इसका सदुपयोग करने के लिए बहुत सारे साधन भी किए जा रहे हैं, पर यह बहुत तेजी से किए जाने चाहिए । अगर  कूड़ा ही ऐसा पैदा हो कि वो धरती मे अपने आप जज़ब हो जाए तो क्या कहने! 

 आइए अभी तो जाना तेरे चलते हैं एक जेन कथा की तरफ। मार्शल आर्ट सीखने के लिए एक लड़का गुरू के पास जाता है । वो वँहा के गुरू से पूछता है कि मार्शल आर्ट सीखने में उसे
कितने साल लगेंगे? 
गुरु ने उसको ऊपर से नीचे तक गौर से देखा और कहा,10 साल ।
लड़के ने फिर पूछा, कि मैं और तेजी से सीखूँ तो कितने साल लगेंगे?
गुरु ने कहा कि 20 साल ।
कबीर जी का दोहा है
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय 

आज के लिए इतना ही।
 फिर मिलेंगे ।
तब तक हंसते रहे मुस्कुराते रहे, आपका अपना रजनीश जस
रूद्रपुर, उत्तराखंड
 निवासी पुरहीरां
 जिला होशियारपुर, पंजाब
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06.09.2020

Stress free life (Punjabi)

 ਸਮਾਜ ਵਿਚ ਇਕ ਸ਼ਬਦ ਬਹੁਤ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਫੈਲ ਰਿਹਾ ਹੈ ਉਹ ਹੈ ਸਟਰੈੱਸ ਮਤਲਬ ਤਨਾਵ।

 ਆਮ ਆਦਮੀ ਸ਼ਰਾਬ ਸਿਗਰੇਟ ਪੀਕੇ, ਮੰਦਿਰ ਜਾਕੇ ਬੱਚਿਆਂ ਤੇ ਘਰਵਾਲੀ ਤੇ ਗੁੱਸਾ ਕੱਢਕੇ ਸਟਰੈਸ ਕੱਢਦਾ  ਹੈ। ਇੱਕ ਵਰਗ ਸਵਿਟਜ਼ਰਲੈੰਡ ਜਾਕੇ , ਵੱਡੀ ਕਾਰ ਲੈਕੇ , ਵੱਡਾ ਘਰ ਖਰੀਦ ਕੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਧੋਖਾ ਦੇਣ ਦਾ ਯਤਨ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਉਸਨੇ ਸਟਰੈੱਸ ਕੱਢ ਲਈ ਤੇ ਉਹ ਖੁਸ਼ ਹੈ ਪਰ ਅੰਦਰ ਖਾਤੇ ਉਹ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹੈ ਉਹ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਦੁਖੀ ਹੈ।

ਜਿਵੇਂ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ  

"ਵੱਡਿਆਂ ਸਿਰਾਂ ਦੀਆਂ ਵੱਡੀਆਂ ਪੀੜਾਂ।"

 

ਹੁਣ ਇਕ ਹੋਰ ਰੀਤ ਚਲ ਗਈ ਹੈ ਕੇ ਮੋਟਿਵੇਸ਼ਨਲ ਗੁਰੂ ਕੋਲ ਜਾਓ , ਉਸਦੇ ਲੈਕਚਰ ਸੁਣੋ।

ਕਈ ਤਾਂ ਬਾਬਿਆਂ ਦੇ ਚੱਕਰ ਚ ਫਸ ਜਾਂਦੇ ਨੇ। ਕੁਝ 

ਬਾਬੇ ਇੰਨੇ ਅਮੀਰ ਹੋ ਗਏ ਨੇ ਉਹ ਲੱਖਾਂ ਰੁਪਏ ਦੀਆਂ ਗੱਡੀਆਂ ਚ ਘੁੰਮ ਰਹੇ ਨੇ ਨੇਤਾ ਵੀ ਓਹਨਾ ਦੇ ਪੈਰੀਂ ਹੱਥ ਲਾਉਂਦੇ ਨੇ।

ਹੁਣ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਮੋਟਿਵੇਸ਼ਨਲ ਗੁਰੂਆਂ ਦੀ। ਇਹਨਾਂ ਵਿਚ ਵੀ ਪੱਛਮ ਦੇ ਕਈ ਲੇਖਕ ਪੂਰੇ ਵਿਸ਼ਵ ਚ ਪੜ੍ਹੇ ਜਾ ਰਹੇ ਨੇ ਜਿਵੇ ਰੋਬਿਨ ਸ਼ਰਮਾ, ਰਾੰਡਾ ਬਰਨ , ਜੋਸੇਫ ਮਰਫੀ।

ਇਹਨਾਂ ਸਭ ਦੀਆਂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦਾ ਮੂਲ ਬੁੱਧ ਹੀ ਨੇ।

 ਬੁੱਧ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ ਤੁਸੀਂ ਜਿਹੋ ਜਿਹਾ ਸੋਚਦੇ ਹੋ ਉਹ ਹੀ ਬਣ ਜਾਂਦੇ ਹੋ। ਇਸਲਈ ਸੋਚ ਨੂੰ ਕੋਈ ਘੱਟ ਤਾਕਤਵਰ ਨਾ ਸਮਝੋ ਇਹ ਸਥੂਲ ਹੈ। 

ਮੇਰਾ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਨਹੀਂ ਕਿ ਇਹ ਲੇਖਕ ਨਾ ਪੜ੍ਹੋ ਮੈਂ ਵੀ ਇਹ ਤਿੰਨ  ਪੜ੍ਹੇ  ਨੇ ਤੇ ਬੁੱਧ ਨੂੰ ਵੀ ਪਡਿਆ ਹੈ।

ਜੋ ਗੱਲ ਇਹ ਲੇਖਕ ਲਿਖ ਰਹੇ ਨੇ ਸਾਨੂ ਉਹ ਖੁਸ਼ੀ ਦਿੰਦੇ ਨੇ ਪਰ ਸਿੱਧੇ ਬੁੱਧ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹੋ ਤਾਂ ਉਸਨੂੰ ਪਚਾਉਣਾ ਔਖਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਸਾਨੂੰ ਸਾਡੇ ਸਾਹਮਣੇ ਨੰਗਾ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਗੱਲ ਬੁੱਧ ਦੀ ਕਿ ਉਹ ਰੱਬ ਦੀ ਹੋਂਦ ਨੂੰ ਨਕਾਰਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕੇ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਬਹੁਤ ਔਖੀ ਗੱਲ ਹੈ। ਇਹੀ ਕਰਨ ਕਰਕੇ ਬੁੱਧ ਦੇ ਭਿਕਸ਼ੂਆਂ ਨੂੰ ਮਾਰ ਮਾਰ ਕੇ ਭਾਰਤ ਤੋਂ ਭਜਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਪਰ ਉਹ ਜਿੱਥੇ ਵੀ ਗਏ ਅੱਜ ਉਹ ਮੁਲਕ ਸਾਡੇ ਤੋਂ ਕੀਤੇ ਅੱਗੇ ਨੇ ਜਿਵੇ ਜਪਾਨ। 

ਬੁੱਧ ਕਹਿੰਦੇ  ਨੇ ਅੱਪ ਦੀਪੋ ਭਵ। ਮਤਲਬ ਆਪਣੇ ਦੀਪਕ ਆਪ ਬਣੋ। ਪਰ ਅਸੀਂ ਠਹਿਰੇ ਗ਼ੁਲਾਮ ਮਾਨਸਿਕਤਾ ਦੇ ਲੋਕ, ਸਾਨੂ ਕੋਈ ਨਾ ਕੋਈ ਸਹਾਰਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਜਿਵੇ ਓਸ਼ੋ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ ਤੁਸੀਂ ਹਨੇਰੇ ਚ ਚਾਲ ਰਹੇ ਹੋਵੋ ਤਾਂ ਡਰ ਦੇ ਮਾਰੇ ਗੀਤ ਗੁਣਗੁਣਾਉਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੇ ਹੋ। ਆਪਣੀ ਹੀ ਆਵਾਜ਼ ਸੁਣਕੇ ਸਾਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕੋਈ ਹੈ।

ਬੁੱਧ ਨੇ ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਕੇ ਓਹੀ ਆਦਮੀ ਸੱਚ ਨੂੰ ਉਪਲਬਧ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਜੋ ਇਹ ਤਿੰਨ ਸ਼ਰਤਾਂ ਪੂਰੀਆਂ ਕਰ ਸਕੇ 

ਜੋ ਆਦਮੀ ਇਕਲਾ ਰਹਿ ਸਕੇ,

ਜੋ ਸੋਚ ਸਕੇ ਤੇ ਇੰਤਜ਼ਾਰ ਕਰ ਸਕੇ।

 

ਬੁੱਧ ਨੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਤਿੰਨ ਸੱਚ ਦੱਸੇ ਨੇ,

ਜੀਵਨ ਦੁੱਖ ਹੈ,

ਦੁੱਖ ਦੇ ਕਾਰਨ ਹੈ ਇੱਛਾ ਤੇ

 ਤੀਜਾ ਸੱਚ ਹੈ ਇਸ ਦੁੱਖ ਤੋਂ ਪਾਰ ਜਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।



ਪਰ ਹਰ ਇਨਸਾਨ ਪਹਿਲੇ ਦੁੱਖ ਨੂੰ ਹੀ ਅਸਲੀ ਸੱਚ ਮੰਨਕੇ ਸ਼ਰਾਬ ਪੀਂਦਾ ਹੈ, ਜੁਆ ਖੇਲਦਾ ਹੈ ਤੇ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਨਰਕ ਕਹਿਕੇ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਚੋਂ ਵਿਦਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

ਉਹ ਦੂਸਰੇ ਤੇ ਤੀਜੇ ਸੱਚ ਬਾਰੇ ਕਦੇ ਕੋਈ ਯਤਨ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। 

ਮੈਂ ਹੁਣੇ ਇੱਕ ਆਦਮੀ ਕੋਲ ਬੈਠਾ ਸੀ। ਉਸਦੀ ਤਨਖਾਹ 80  ਜਾਂ 90 ਹਾਜ਼ਰ ਹੋਵੇਗੀ ਉਸਦਾ ਚੇਹਰੇ ਇੰਝ ਸੀ ਜਿਵੇਂ ਮਾਰ ਕੁੱਟ ਕੇ ਸੁੱਟਿਆ ਹੋਵੇ। ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਸਟਰੈੱਸ ਬਹੁਤ ਹੈ ਕਿ ਪਹਿਲਾਂ ਦਿਨੇ ਕੰਮ, ਫਿਰ ਰਾਤ ਨੂੰ ਸੌਣ ਵੇਲੇ ਵੀ ਕੰਮ ਦੀ ਚਿੰਤਾ।

 ਮੈਂ ਪੁੱਛਿਆ ਤੁਸੀਂ ਸ਼ਾਂਤ ਰਹਿਣ ਲਈ ਕੋਈ ਕਿਤਾਬ ਪੜ੍ਹਦੇ ਹੋ,  ਧਿਆਨ ਕਰਦੇ ਹੋ , ਕੋਈ ਸ਼ੌਂਕ ਜਿਵੇ ਗੀਤ ਗਾਉਣਾ , ਬਾਗ਼ਬਾਨੀ ਕਰਨੀ?

 ਉਸਨੇ ਕਿਹਾ ਅਜਿਹਾ ਕੁਝ ਨਹੀਂ।

 ਫਿਰ ਮੈਂ ਕਿਹਾ ਕੇ ਜੇ ਬਿਮਾਰੀ ਦੇ ਗੁਣ ਗਾਉਂਦੇ ਰਹੋਗੇ ਤਾਂ ਬਿਮਾਰੀ ਹੀ ਫੈਲਦੀ ਜਾਵੇਗੀ।


ਬੁੱਧ ਨੇ ਇਹ ਕਿਹਾ ਕੇ ਬਿਮਾਰੀ ਨੂੰ ਹਰ ਵੇਲੇ ਵਿਸ਼ਾ ਬਣਾਉਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਸਦੇ ਹੱਲ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰੋ।


 ਪਰ ਅਸੀਂ  ਕਰਨੀ  ਹੀ ਨਹੀਂ।


ਚਲੋ ਅੱਗੇ ਵਧਦੇ ਹਾਂ।

ਅਸੀਂ ਪਹਿਲਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਹੀ ਨਹੀਂ ਸਵੀਕਾਰਦੇ,  ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਿਵੇਂ ਕਰਾਂਗੇ।

 ਸਾਡਾ ਵੱਸ ਚੱਲੇ ਤੇ ਆਪਾਂ ਆਪਣੇ ਕਈ ਟੋਟੇ ਕਰ ਦਈਏ। ਕਿਉਕਿਂ ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੀਆਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਆਦਤਾਂ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ।

ਫਿਰ ਗੱਲ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਾਰਨ ਦੀ।

 ਜੇ ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੀਆਂ ਕਮੀਆਂ ਸਮੇਤ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਤਾਂ ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਾਂਗੇ?

 

ਮੈਂ ਇਕ ਵਾਰ ਓਸ਼ੋ ਦੇ ਮੇਡੀਟੇਸ਼ਨ ਕੈਂਪ ਚ ਇਕ ਧਿਆਨ ਦੀ ਵਿਧੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕਰੋ। ਉਹ ਕਰਦੇ ਕਰਦੇ ਮੇਰਾ ਮਨ ਕਰੁਣਾ ਨਾਲ ਭਰ ਗਿਆ , ਮੈਨੂੰ ਲੱਗਾ ਮੈਂ ਪਹਿਲੀ ਵਾਰ ਅਜਿਹਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ। ਤੁਸੀਂ ਅੱਖਾਂ ਬੰਦ ਕਰਕੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪੁੱਛੋ , ਤੁਸੀਂ ਕਿੰਨੀ ਵਾਰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਪਿਆਰ ਕੀਤਾ ਹੈ? ਮੈਂ ਜਾਣਦਾ ਹਾਂ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨਾਲ ਅੱਖ ਨਹੀਂ ਮਿਲਾ ਪਾਓਗੇ।


ਹੁਣ ਗੱਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਪਿਆਰ ਦੀ।

" ਪਿਆਰ ਕਿਸੇ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਦੀ ਤਲਾਸ਼ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਇਹ ਅਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਪੂਰਨ ਦੇਖਣ ਦੀ ਕਲਾ ਹੈ। "

Love is not to find perfect, it is an art to see imperfect perfectly.


Sodhi Parminder ਜੀ ਦੀ ਇਕ ਕਵਿਤਾ ਹੈ,  ਇਹ ਤਿੰਨ ਸਤਰਾਂ ਦੀ ਹਾਇਕੂ ਕਵਿਤਾ ਮੈਂ ਬਹੁਤ ਵਾਰ ਦੁਹਰਾਉਂਦਾ ਹਾਂ 

ਆਓ ਆਪਣੇ ਹੀ ਹੋਣ ਦਾ

ਜਸ਼ਨ ਮਨਾਈਏ 

ਕਿੰਨਾ ਖੂਬਸੂਰਤ ਹੈ ਸਾਡਾ ਹੋਣਾ 


ਓਸ਼ੋ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਇਹ ਕਹਿੰਦੇ ਰਹੇ

ਉਤਸਵ ਅਮਾਰ ਜਾਤੀ 

ਆਨੰਦ ਅਮਾਰ ਗੋਤਰ 


ਕਿਸੇ ਨੇ ਕਿਹਾ ਹੈ 

ਆਓ ਸਜਾ ਲੇਂ ਆਜ ਕੋ 

ਕਲ ਕਿ ਖ਼ਬਰ ਨਹੀਂ

ਕਲ ਕੀ ਕਿਆ ਕਹੇਂ

ਯਹਾਂ ਪਲ ਕਿ ਖ਼ਬਰ ਨਹੀਂ 


ਜੀਵਨ ਚ ਜਿਸਨੇ ਇਹ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਕਿ

ਜੀਵਨ ਇਕ ਹੀ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਇਥੇ ਕੁਝ ਵੀ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਨਹੀਂ, ਉਹ ਸਟਰੈੱਸ ਮੁਕਤ ਹੋਣ ਦੀ ਯਾਤਰਾ ਤੇ ਨਿਕਲ ਪਿਆ ਹੈ।


ਸਮੇਂ ਦੀ ਚੱਕੀ ਚ ਸਭ ਕੁਝ  ਪਿਸ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਸਭ ਕੁਝ ਬਦਲ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜੋ ਇਹ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਅਜਿਹਾ ਆਦਮੀ ਕਦੇ ਸਟਰੈਸ ਚ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦਾ ਉਹ ਹਰ ਪਲ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਮਨਾਉਂਦਾ ਹੈ ਉਸਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਇਥੇ ਕੁਝ ਵੀ ਸਥਿਰ ਨਹੀਂ ਤਾ ਮੈਂ ਕਿਸੇ ਦੁੱਖ ਕਿਉਂ ਮਨਾਵਾਂ? 

ਜਿਵੇ ਇਕ ਵਾਰ ਦੋ ਜੇਨ ਫ਼ਕੀਰ ਪਿੰਡ ਚੋ ਭਿਕਸ਼ਾ ਮੰਗ ਕੇ ਆਏ। ਓਹਨਾਂ ਨੇ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਓਹਨਾਂ ਦੇ ਛੱਪਰ ਦੀ ਅੱਧੀ ਛੱਤ ਬਰਸਾਤ ਤੇ ਹਨੇਰੀ ਨਾਲ ਉੱਡ ਗਈ ਹੈ।

ਪਹਿਲੇ ਫ਼ਕੀਰ ਨੇ ਆਸਮਾਨ ਵੱਲ ਮੂੰਹ ਕਰਕੇ ਰੱਬ ਨੂੰ ਸ਼ਿਕਾਇਤ ਕੀਤੀ "ਹੇ ਰੱਬਾ ਅਸੀਂ ਤੇਰੇ ਬੰਦੇ ਹਾਂ। ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਜਪਦੇ ਹਾਂ, ਤੂੰ ਸਾਡੇ ਨਾਲ ਅਜਿਹਾ ਮਾੜਾ ਕੰਮ ਕੀਤਾ। ਦੁਨੀਆਂ ਚ ਕਿੰਨੇ ਪਾਪੀ ਲੋਕ ਨੇ ਓਹਨਾਂ ਦੇ ਘਰ ਦੀ ਛੱਤ ਉਡਾ ਦਿੰਦਾ।" 

ਦੂਜਾ ਫ਼ਕੀਰ ਉਸ ਵੇਲੇ ਰੱਬ ਨੂੰ ਹੇਠ ਜੋੜਕੇ ਪ੍ਰਾਰਥਨਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ " ਹੇ ਰੱਬਾ ਤੂੰ ਕਿੰਨਾ ਦਿਆਲੂ ਹੈ, ਅੱਜ ਪੂਰਨਮਾਸ਼ੀ ਦੀ ਰਾਤ ਹੈ ਮੈਂ ਪੂਰਾ ਚੰਦਰਮਾ ਦੇਖ ਸਕਾਂ ਇਸ ਲਈ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਘਰ ਦੇ ਅੱਧੀ ਛੱਤ ਉਡਾ ਦਿੱਤੀ। ਮੈਨੂੰ ਤੇਰੀ ਹਸੀਨ ਕਾਇਨਾਤ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਹੋ ਸਕਣ, ਧੰਨ ਹੈ ਤੂੰ ।

ਸੋ ਸਾਡੀ ਸੋਚ ਕਿ ਹੈ , ਅਸੀਂ ਕਿਸੇ ਪਰਿਸਥਿਤੀ ਨੂੰ ਕਿਵੇਂ ਪ੍ਰਤੀਕਿਰਿਆ ਕਰਦੇ ਹਾਂ ਉਹ ਸਾਡੇ ਜੀਵਨ ਚ ਖੁਸ਼ੀ ਜਾਂ ਗ਼ਮੀ ਬਣਦੀ ਹੈ।


ਕਿਸੇ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ ਖੁਸ਼ੀ ਤੇ ਤਨਾਅ ਕੀ ਹੈ?

ਜਵਾਬ ਮਿਲਿਆ ਜੋ ਤੁਸੀਂ ਹੋ ਉਹ ਖੁਸ਼ੀ ਹੈ, ਜੋ ਤੁਸੀਂ ਹੋਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਉਹ ਤਨਾਵ ਹੈ। 


ਅੱਜ ਲਈ ਇੰਨਾ ਹੀ। 

ਫਿਰ ਮਿਲਾਂਗੇ। 

ਆਪਦਾ ਆਪਣਾ 

ਰਜਨੀਸ਼ ਜੱਸ

ਰੁਦਰਪੁਰ

 ਉਤਰਾਖੰਡ

ਨਿਵਾਸੀ ਪੁਰ ਹੀਰਾਂ 

ਹੁਸ਼ਿਆਰਪੁਰ 

ਪੰਜਾਬ 

#budha

#stress_free_life

#stress

Sunday, May 10, 2020

Sunday Diaries 10.05.2020

 रविवार है तो किस्से, कहानियां दोस्तों के साथ गपशप चल रही है। इस लॉक डाउन के दौरान बहुत सारी नई चीजें अनुभव की है जो शेयर कर रहा हूं जैसे कि ज़रूरतों और ख्वाहिशों के बीच जो बारीक की लकीर है उसको देखा। ये अलग बात है  किसी की ज़रूरत सूखी रोटी है, और ख्वाईश है  दूसरे की देसी घी की चुपडी रोटी। देखा जाए तो घर के राशन का खर्चा बहुत ही कम आता है फिर बाकी खर्चे कहां से होते हैं? वो खर्चे हैं मकान की किश्त, कार की किश्त।
  चलिए चलते हैं घुमक्कड़ी पर वापस।  मेरा गांव पुरहीरां से होशियारपुर लगभग 6 किलोमीटर है।

 मैं , मेरी बहन , मेरी बुआ, मेरी बुआ की बेटी, हम चारों गाँव से 6 किलोमीटर पैदल चलकर शहर गये।  पता चला था कि उनके घर में दुबई से चॉकलेट आई हुईं हैं। उनके घर गए तो वहां कोई चॉकलेट नहीं मिली। वापस आने के लिए सिर्फ किराया था। तो फिर आटो में बैठकर हम वापिस आ गये। अब इस बात को याद करते हैं तो हंसी आती है। ये बात हमने घर पर नहीं बताई क्योंकि घर पर बताते तो खूब पिटाई होती।


 मेरे घर के साथ वाले घर कोई नहीं रह रहा और वहां छत्त पर कम से कम 25- 30  गमले हैं जिनमें पौधे लगे हुए हैं। मेरी पत्नी  ने कहा कि अगर हम पानी दें तो पौधे सूखने से बच जाएँगे।पूरे लाकडाऊन के दौरान उनको पानी दिया सारे के सारे हरे भरे हो गए हैं।
 एक दिन घर पर दो लड़के आए हो वह कह रहे कि उन्हें भूख लगी हुई है। उनको  खाना खिलाया। फिर उन्होंने कहा कि प्यास लगी हुई है। हम  कोरोना के चक्कर में डर रहे थे। फिर उन्हें बोतल में पानी दिया वो दोनों दो दो  बोतल पानी पी गये। हमने पूछा तुम्हारे माता पिता  कहां हैं ? वो बताए कि वो काम के लिए  कहीं बाहर गए थे लाकडाऊन में वँही फस गये। हमने कहा कि तुम रोज़ खाना खाने आ जाया करो।

 अभी मैं देख रहा था कि 85 साल की औरत है जो एक रूपये में इडली दे रही है जो लोग राहगीर  अपने अपने घरों को चल रहे हैं।

इस लाकडॉउन के दौरान जो लोग घर पर बैठे हैं और अपनी ऊर्जा को सकारात्मक नहीं लगा रहे हैं उनकी ऊर्जा नकारात्मकता की तरफ बढ़ रही है ।अपने अंदर  बिमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक शक्ति को पैदा करें।  विटामिन सी, तुलसी और डाक्टरों की सलाह पर अमल करें।  कुछ ना सही तो खूब सारी तालियां बजाकर हंसते भी रहे इससे भी हमारे अंदर बीमारियों को लड़ने की शक्ति पैदा होती है।

 मैं ओशो को सुन रहा था । एक कहानी है।
 एक बार एक फकीर शहर के बाहर रह रहा था। वो बैठा था तो उसके पास से काला से साया गुज़रा।  उसने पूछा तुम कौन हो?  उसने कहा मैं एक महांमारी हूँ। फकीर ने कहा क्या इरादा है? उसने कहा लगभग 500 लोग इस महामारी से मारे जाएंगे और वह शहर में चली गई । फकीर को पता चला कि इस महामारी से लगभग 5000 लोग मर चुके हैं। जो फिर से काला साया उसके पास से गुजरा हो तो उसने कहा कि तुमने तो कहा था मैं 500 लोगों को ही मारूँगी पर तुमने तो  5000  लोग मार दिए। वो कैसे मर गए?  तो  महामारी ने कहा कि मैनें तो 500 ही मारे, बाकी 4500  तो डर के कारण ही मर गए।

 तो बीमारी से बड़ा बीमारी का डर है। इसका मतलब यह नहीं कि आप एहतियात  ना बरतें, पर मन में इतना भी डर पैदा ना करें कि आपके स्वास्थ्य को हानि पहुंच जाए।
इन दिनों दो  दुखद घटनाएं हुई विशाखापट्टनम में गैस की लीकेज से  और  औरंगाबाद में मजदूरों का मर जाना। दोनों ही बहुत ही दुखद हैं।

  हम फिर भी पूरे विश्व के मंगल का कामना करते हैं और कहते हैं कि हर प्राणी हर आदमी यहां सुरक्षित रहे।
फिर मिलूंगा इक नये किस्से के साथ। तब तक विदा लेता हूँ।
आपका अपना
रजनीश जस
 रूद्रपुर ,उत्तराखंड
#sundaydiaries
#rudarpur_cycling_club

Sunday, May 3, 2020

#sunday_diaries_03.05.2020

 आज रविवार है तो किस्से कहानियां ही चल रहे हैं साइकिलिंग तो अब एक सपना हो गया है।
 संजीव जी ने ऑनलाइन मीटिंग अरेंज की और फिर मिल गए कुछ दोस्त। राजेश जी हरियाणा में अपने घर पर है, पंकज दिल्ली में है, शिवशांत, संजीव  मैं रूद्रपुर ही।  पंकज ने बताया कि दिल्ली में बेशक रेड जोन हैपर  सब्जी वाला आता है , सब्जी खरीदते हैं उसकी दाढ़ी भी काफी बढ़ चुकी है, ऐसा ही राजेश सर का हाल भी है। राजेश जी के घर काफी पेड़ हैं। घर के इर्द-गिर्द बहुत सारी खुली जगह होने के कारण वो स्वच्छ हवा का आनंद ले रहे हैं। संजीव जी भी पंतनगर यूनिवर्सिटी नहीं गए है। शिवशांत भी घर पर है।
 कोरोना को लेकर बातचीत हुई, संजीव जी ने बताया कि उन्होंने बीबीसी  पर पढा कि एक पत्रकार के कहा कि उसने पिछले 10 साल से हाथ साबुन से नहीं धोए ।इस बात को लेकर हंगामा हुआ।
 इसलिए भी पश्चिमी देशों में  कोरोना ज्यादा फैला। इटली मे जो लोग शापिंग माल में जाते थे वो जूते घर के अंदर भी ले आते थे, ये भी एक कारण रहा।

भारत में अगर हम साऊथ की तरफ जाते हैं तो वहां देखते हैं कि वहां पर जो लोग हैं उनके घर के बाहर  घड़ा रखा होता है। जब वह बाहर से आते हैं अपने हाथ पैर धोकर और फिर घर में आते है।  मेरे दोस्त इटली से बता रहा था कि उनको फैक्ट्री में यह बताया जाता है कि साबुन से हाथ कैसे हाथ धोते हैं? पर ये परंपरा भारत में पहले से ही है। हम मिलकर दुआ करते है पूरे विश्व में कोरोना का कहर कम हो, चाहे वो हाथ धोते हो या नहीं।

 इंटरनेट पर फायदा तो है कि सब दोस्तों से बातचीत हो रही है और सब कुशल मंगल है।
 रुद्रपुर में घरों के बाहर आम पेड़ लगे हुए हैं ।जिन पर कच्चे आम लग गये  हैं अब गर्मी जो आ गयी है ।




 एक वीडियो में देख रहा था बहुत अच्छी  कहानी है ।
एक लड़का किसी मल्टीस्टोर से कुछ टीके लगाने वाली सिरेंज और  नैपकिन लेकर आ रहा होता है। तो उस रास्ते में एक औरत मिलती है। वो औरत कहती है कि उसे शुगर है तो इंसुलिन लेनी है तो उसको यह सिरेंज जरूरी चाहिए। वो लड़का मना कर देता है। वो भागी भागी स्टोर पर   जाती है । वो  बंद हो चुका होता है। उसको चलाने वाला  बताता है कि एक लड़काअभी अभी सारी सिरेंज ले गया है। वो जब वापिस आती है तो देखती है सड़क पर वही लड़का सिरेंज बेच रहा   होता है। वो जब दाम पूछती तो वो  $50 बताता है , हालांकि वह  $15 की है। उसको कहती है कि यह तो बहुत गलत बात है । लड़का कहता है यही बिजनेस है , कोरोना के चक्कर में उसको पैसे कमाने हैं । औरत अपनी जेब से डॉलर निकालती है तो $40 इकट्ठे होते हैं। वो लड़का मना करता है।  तो फिर वह अपने परस् से सिक्के  देखती है तो वह भी $7 हो पाते हैं। अभी भी $3 कम के कारण लड़का ना में सिर हिलाता है। वो औरत अपनी पिछली जेब में देखती है तो बड़ी मुश्किल से $3 मिलते हैं। वो उस लड़के को दे देती है और वहां से सिरेंज लेकर चली जाती है। तुरंत लड़के के पास ही फोन आता है कि उसकी मां बीमार है तो वह सारी दुकान समेटकर घर की तरफ भागता है । वो घर जाकर  दिखता है वहां उसकी माँ बिस्तर पर बिमार पड़ी है। उसकी मां को शूगर है।  उसको भी इंसुलिन की जरूरत पड़ी पर घर में सिरिंज खत्म हो गई थी। वह इर्द-गिर्द  स्टोर पर घूमी पर वहाँ नहीं मिली ।उसने अपने दोस्तों से भी बात की पर किसी ने कोई हामी नहीं भरी। वह लड़का कहता है कि मां मेरे पास तो सिरेंज थी पर अभी अभी मैं वह बेच कर आ रह हूँ। वह मार्केट जाने लगता है तो उसकी  माँ उसको रोक देती है। वो कहती है कि मेरे पास ही बैठ जा । वह बहुत परेशान होते हो जाता है।

 पर उसी वक्त एक औरत आती है उसके हाथ में सिरिंज होती है। पर इत्तेफाक यही है कि वही औरत है जिसको उसने $50 में वह $15 वाली सिरेंज बेची  थी।  जैसे ही वो लड़का उसको देखता है तो कहता है आप यँहा?  उसकी माँ पूछती कि आप दोनों एक दूसरे को जानते हो? तो वो औरत कहती है ये  बाद की बात है पहले तुम पहले इंसुलिन लो, फिर हम बाद में बात करते हैं। लड़का जब बढ़कर उसके हाथ से वह सिरेंज लेने लगता है तो पूछता कितने पैसे? वो कहती है कुछ नहीं। वो कहती है जब कोई टरेशान होकर आपसे मदद मांगे तो सोचें कभी आप भी उसकी जगह पर हो सकते हैं।
वह लड़का फिर  शर्मिंदा होकर उससे सिरिंज ले लेता है। इस तरह इंसुलिन उसकी मां को मिल जाती है।
 इसके बाद वही लड़का उसी जगह पर खड़े होकर फ्री सिरिंज और नैपकिन बेच रहा होता है। एक लड़की आती है तो उस उससे जब मैं फ्री में नैपकिन देता है तो लड़की पूछती है  कितने डॉलर तेरा मुफ्त में ले जाओ? वो लड़की पूछती है पर वो कहता है ले जाओ। लड़की नैपकिन लेकर कहती है ,गॉड ब्लेस यू। लड़का भी उसको कहता है  गॉड ब्लेस यू टू । तो पास में खड़ी वही औरत देखकर उसको मुस्कुरा रही होती है।

 इस लॉक डाउन के दौरान बहुत सारे लोग हैं जो अपना बिजनेस चमकाने में लगे हुए हैं पर साथ में कुछ नहीं जाएगा , एक गीत है ना सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा।
 दुनिया भर में अगर सिख कम्युनिटी को देखा जाए तो वह उन्होंने हर जगह लंगर लगा रहे हैं वो भी पूरा  सोशल डिस्टेंस मेंटेन करते हुए ।हमारी ही कंपनी में एक लड़का देवेंद्र है जिसके घर पर हर रोज गुरुद्वारे से 10 किलो आटा आता है तो उसकी माताजी रोटियां बना देती हैं और सारी रोटियां गुरुद्वारे में चली जाती हैं ।
लंगर की परंपरा गुरु नानक देव जी की चलाई हुई है । जो कि घर से निकले थे जो उनके पिता ही ने बोला था कि ₹20 ले लो और एक सच्चा सौदा करके आओ। वो  घर से शहर की तरफ जा रहे थे तो रास्ते  साधु मिले तो उन्होंने ₹20 का उनको खाना खिला दिया। वहीं  लंगर की प्रथा शुरू हुई है और आज दुनिया भर में लोग लंगर बांट रहे हैं। ऐसे बहुत सारे काम है जो हो रहे हैं यह जिनकी हमें बातचीत करनी चाहिए अपने बच्चों को बताना चाहिए कि हर चीज़ पैसे से नहीं, मुफ्त में भी मिलती है, पर उस मुफ्त के पीछे कौन सी परंपरा है, किसने शुरू की थी, हम तक कैसे पहुंची है उनको बताना भी बहुत जरूरी है।

 शिव शाम में मई दिवस के मजदूरों के ऊपर एक फौजी अच्छी वीडियो बनाई है कि 1 मई को याद घंटे की शिफ्ट के पीछे शिकागो में जब 16 से 18 घंटे लोगों को काम लिया जाता था तो उन लोगों ने जब विद्रोह किया तो पुलिस ने उनके ऊपर गोलियां दागी ।उनमें से 4 लोगों को फांसी दी गई। पर जब फांसी दी जा रही थी तो उन्होंने बोला कि आप हमारी आवाज़ को बंद अब आ नहीं सकते तो वहां से जब यह पूरे विश्व भर में विद्रोह हुआ वहां विद्रोह हुआ तो यह शिफ्ट 16 घंटे से घटकर 8 घंटे पर आ गई और 1 मई से यह मजदूर दिवस मनाया जाने लगा ।

आज के लिए इतना ही। अब मैं विदा लेता हूँ। फिर मिलूंगा एक नए किस्से के साथ ।

आपका अपना
रजनीश जस
रूद्रपुर
उत्तराखंड
#sundaydiaries
#rudarpur_cycling_club
03.05.2020

Sunday, April 26, 2020

Sunday diaries 26.04.2020

रविवार है तो दोस्तों के साथ बातचीत करने का मन हुआ क्योकिं लाकडाऊन के चलते साईकलिंग नही हो रही। आज सुबह ही बादल घिर आए और अब बारिश शुरु हो गई है।

 संजीव जी ऑनलाइन हुए ।
उन से बातचीत हुई तो मैनें पूछा,  बच्चे क्या कर रहे हैं?  तो उन्होंने कहा कि उनका छोटा बेटा ड्राइंग करता है। ड्राइंग करने में भी उन्होंने एक दिलचस्प बात बताई कि इससे आदमी का सोचने की शक्ति बढ़ती होती है और कल्पना जगत भी फैलता है, कि जैसे कि  बच्चा जो  सीधी लाइन लगाता है तो उसको पता होता है अगर वो लाइन को टेढा करेगा तो इससे क्या बनने वाला है? वह बता रहे थे कि जितनी भी वह ए 4 शीटें लेकर आते हैं उनका बेटा उस पर अपनी ड्राइंग करने लगता है। अच्छी बात है अपनी कल्पना जगत को बढ़ाना।
मेरे घर के आगे जो गुलमोहर का पेड़ है, वो 4 से 25 April तक कितना हर भरा हो गया है और अब तो लाल रंग के फूल भी आ गये हैं, उसकी तीनों तसवीर शेयर कर रहा हूँ, पर बाएँ से दाएँ देखें।


 अभी मैं सोच रहा था अपने हॉस्टल के दिनों की डायरी के बारे में लिखने के लिए। तो  मेरे दोस्त ने बहुत अच्छी बात कही, एक तो  डायरी बहुत लंबी हो जाएगी और जो लोग उसका हिस्सा नहीं है उनको बोर करेगी। दूसरा हो सकता है उनमें से अगर आप वही नाम ले तो सामने वाले को आप से नफरत भी होने लगे, क्योंकि हॉस्टल के दिनों में जिनके नाम उल्टे सीधे थे आज वो बहुत अच्छी पोस्ट पर है, कोई बिज़नेसमैन है ।
संजीव जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि इसको संस्मरण कहते हैं। उन्होंने भी पंतनगर यूनिवर्सिटी में रहते हुए अपने दोस्तों के साथ जो खुशनुमा पल बिताए हैं उनके ऊपर होने दो बार संस्मरण भी लिखे हैं, पर इन संस्मरण में वह उसका पूरा नाम ना लेकर उसके शहर का नाम ले लेते हैं। इससे पढ़ने वाले को मजा भी आता है और जिसकी यह बात होती है उसको बुरा भी नहीं लगता। अब उन्होंने कई उनके कई साथी अच्छी-अच्छी पोस्ट करें क्योंकि उन्होंने आईआईटी रुड़की से पास आउट किया है कोई यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में सिविल डिपार्टमेंट का  एच ओ डी  है और कोई एनटीपीसी में।

 बाकी दोस्त  शायद व्यस्त हैं तो हो हमें जवायन नहीं कर पाए पर वो यह पोस्ट पढ़ कर इसको ही पूरा मजा ले सकते हैं।

 इसी लॉक डाउन के दौरान बहुत सारे अच्छे काम भी हो रहे हैं । जैसे कि हमारे एक दोस्त है राजू विश्वकर्मा उन्होंने अपने घर में अपनी माता और पत्नी के से 50 फेस मास्क बनाए और लोगों को मुफ्त में बांटें  हैं। यह सराहनीय काम है।
 ऐसे ही संजीव जी ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर लगभग डेढ़ लाख रुपये इक्ट्ठा करके दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल में 300 पी पी ई दिए हैं, जिसमें पूरी ड्रेस होती है जो के डॉक्टर पहनकर जाता है कोविड-19 मरीजों का इलाज करने के लिए। उन्होनें अपने यहां पर पंतनगर यूनिवर्सिटी में काम करने वाले लोगों के लिए भी 25 ऐसे पीपी ई ड्रेस मंगवाए हैं। ऐसे बहुत से लोग लगे हुए हैं जो कि पूरी दुनिया का भला मांग रहे हैं इन सभी  को बहुत सलाम।


 आज मुझे" दो आंखें बारह हाथ"  फिल्म याद आ रही है। वी शांताराम की एक बहुत ही क्लासिक फिल्म है एक जेलर जो कि 6 कैदियों को सुधारता है।उसमें एक खिलौने वाली होती है वो एक बहुत ही अच्छा गाना गाती है

आओ आओ होनहार ओ प्यारे बच्चे
प्यारे बच्चे, उम्र के कच्चे ,बात के सच्चे
जीवन की इक बात सुनाऊं
जीवन की एक बात सुनाऊं
 मुसीबतों से डरो नहीं
बुज़दिल बनके मरो नहीं
 रोते रोते क्या है जीना
 नाचो दुख में तान के सीना

 रात अंधियारी हो
 घिरी घटाएं कारी हो
 रास्ता सुनसान हो
आंधी और तूफान हो
मंजिल तेरी दूर हो
पाँव तेरे मजबूर हो
तो क्या करोगे ?
रुक जाओगे
तका तका धुम धुम
तका तका धुम धुम

देश में बिपता भारी हो
जनता दुखियारी हो
भुखमरी अकाल हो
आंधी और तूफान हो
मुल्क में हाहाकार हो
चारों तरफ पुकार हो
तो क्या करोगे
चुप बैठोगे?
नहीं
तका तका धुम धुम

 इसका जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि आज देश को उन लोगों की ज़रूरत है जो अपने सुख को त्याग कर  दूसरों की सेवा करने में लगें।

इस फिल्म में 6 कैदी हैं जो कि बहुत ही खूंखार होते हैं, कई कैदियों ने कत्ल भी किया होता है।  उनके मन को बदलना बहुत ही मुश्किल काम था, एक जेलर अलग अलग तरीके से कैसे उनको बदलता है , वो फिल्म देखने पर ही पता चलता है। वो बंजर ज़मीन को खेती के लायक बनाते हैं , फिर खेती करते हैं। शैतान लोग उनके खेत में जंगली जानवर छोड़ देते हैं और फसल तबाह कर देते हैं। तो उसी जंगली जानवर के सीन फिल्माते  हुए वी शांताराम के बहुत गहरी चोट लगी थी, यह बात उन्होंने अपनी अगली फिल्म नवरंग के शुरुआत में बताई। इसमें जेलर का रोल वी शांताराम ने खुद निभाया है।
 फिल्म के आखिर में एक गीत गाया जाता है जो कि हम लोगों में छोटे होते हैं अपने मॉर्निंग प्रेयर में भी गाया है।
ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चलें
और बदी से टलें
ता कि हसते हुए निकले दम

  डॉक्टर, पुलिस, सफाई कर्मी, बैंक वाले सब लगे हुए हैं वह भी अपनी जान पर खेलकर हमारे लिए सारा काम कर रहे हैं । तो हम सब मिलकर यह प्रार्थना करें कि वो भी सुरक्षित रहें अपने परिवार के साथ। कहते हैं दवा से ज्यादा असर दुआ में  होता है।

 तो फिर मिलेंगे एक नए किस्से के साथ।
 अभी के लिए विदा लेता हूंँ।
आपका अपना
रजनीश जस
 रूद्रपुर
 उत्तराखंड
26.04.2020
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#sunday_diaries