Sunday, March 29, 2020

किस्से मेरे गाँव पुरहीराँ(होशियारपुर, पंजाब) के

 21 दिन लाकडाऊन, मतलब हमारे पास 21 दिन हैं, खुद को समझने में, दूसरों को समझने में।

सुना है कि कोई काम हम 21 दिन लगातार करते हैं तो वो हमारी आदत बन जाती है। तो अच्छे काम करें 21 दिन तक ,जो आगे के चल कर वो आदत बनें और हमारी जिंदगी में आनंद, उत्सव और शांति पैदा हो सके। क्योंकि विश्व की शांति एक आदमी के शांत मन से शुरू होती है। अगर एक आदमी का मन शांति , प्रेम से भरा हो तो दूसरे लोग शांत होंगे तो विश्व में करूणा और शांति बढेगी।

 पर इसके साथ शर्त ये भी है घर पर ही रहें।

 मुझे याद आ रहा था मेरे पास जब नौकरी नहीं थी। मैं सुबह देरी से उठता था, तब तक पिता जी सैर करके वापिस आ जाते हैं।
पिता जी, हर रोज़ डाँटते, सुबह उठकर सैर कर लिया करो।
मेरा एक दोस्त था बिट्टु अब गैरी काहलों ( नाम तो उसका गुरमेल सिंह है, गैरी काहलों ,कनाडा में नाम मोडिफाई हो गया है) और मैं , दोनों बिना नौकरी के थे।
मैनें कहा, यार सुबह-सुबह बापू की डाँट बहुत पड़ती है,  कि तुम सैर नहीं करते हो?
 तो उसने यह कहा, ये इसलिए नहीं पड़ती है कि तुम  देरी से उठते हो, बल्कि ये इसलिए है कि तुम नौकरी नहीं कर रहे हो। अगर तुम नौकरी करो, तो संडे को जितने चाहे मेरी मर्जी देरी से उठो।
तब जाकर खोपडी में बात घुसी।


फिर  हम दोनों ने मिलकर डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी का पास बनवा लिया । वहां से किताब लाकर पढ़ने लगे।लाइब्रेरी  किताबें लाकर पढ़ते तो  समय का सदुपयोग होने लगा।

मुझे एक हँसी वाला किस्सा भी याद आ रहा है। उन दिनों नया नया इंटरनेट शुरु हुआ था।  ₹20,  एक घंटे के लगते थे। गांव में गर्मी होती तो हमने  ₹20 दोनों ने डालने और 40 हो जाते। स्कूटर पर  पुरहीराँ , गाँव से होशियारपुर  जाकर 2 घंटे एसी में  बैठ कर  इंटरनेट पर चैटिंग करते। उन दिनों में Yahoo Mesaanger पर लोग चैटिंग करते थे।  लड़के की आई डी देख कर हमसे  कोई चैटिंग नहीं कर रहा था। तो हम परेशान हो गये।
एक  खुराफाती आईडिया दिमाग में आया। हमने एक लड़की के नाम से आईडी  बनाई। तो तुरंत लड़कों के कमेंट आने शुरू हो गए,
 हाय बेबी,
 हाउ आर यू
 हाउ क्यूटी

सब ने भी खूब मजे लिए।

 तभी तो मैं वह स्त्री दिवस पर यह जरूर लिखता हूं उन लड़कों को भी स्त्री दिवस की बधाई जो लड़की की आई डी बनाकर फेसबुक और ट्विटर पर लड़कों का मन बहलाते हैं।😁😁😁

 बिट्टू के साथ मेरे बहुत सारे किस्से हैं। हम दोनों ओशो पढ़ने लगे थे । तो पता चला कि हिमालय से  दो हठयोगी होशियारपुर में आए हुए हैं। हम  स्कूटर लेकर वँहा पहुंच गए । उन से बातें करने लगे । उनके  लंबे लंबे बाल, उन्होनें जोगिया रंग के कपड़े पहने हुए थे। बातों बातों में शायद मैंने ओशो का जिक्र कर दिया। बस पूछो मत वैसे भड़क गए। मैंने बिट्टू की तरफ देख कर इशारा किया,  भैया भाग ले यहां से नहीं तो बहुत पिटने वाले हैं। उन्होनें तर्क से बात करने की बजाय उन्होनें क्रोध का साथ देना उचित समझा और हमने उचित यही समझा के यहां से भाग चलो। तो हम दोनों वँहा से  भाग लिए।😁😁😁

 हमारे गांव में एक और लड़का है बिंदा वो आजकल  इंग्लैंड में है। मैं और मेरा दोस्त रिंकू जो कि इटली है ( उससे मेरी बात हुई है, वो घर पर है,सुरक्षित है। भगवान से उसकी ओर पूरे विश्व की अच्छी सेहत की दुआ करता हूँ) , तो  रिंकू ने जिम करना शुरू किया। मैं जब पहले दिन गया तो बिंदा मेरी तरफ देख कर बोला, कि तुम भी वेट लिफ्टिंग करो। अब आप सोचो, एक लड़का जिसकी कमर 29 इंच की हो, जिसे पतला होने के कारण बहुत बार मजाक बनना पड़ रहा हो, वो ओर मजाक का पात्र नहीं बनना चाहता था ।

मैंने कहा, मुझको नहीं आता है, तो उसने कहा पहले सिर्फ खाली 5 किलो ही करो। फिर उसने एक रोड में वेट डाला और मैनें उठाया। बिंदा पीछे खड़ा हो गया। मैं डर रहा था, पर उसने मुझे हौंसला दिया। बस फिर तो, ऐसा हुआ कि सुबह शाम 3 महीने हमने जिम ही किया।
ऐसा जुनून छा गया था कि एक बार बिजली नहीं थी, तो हमने मोमबत्ती की रोशनी में जिम किया।
 मेरा चेहरे का अलग ही रौब आ गया था। मैं खड़ा-खड़ा ही 1 किलो दूध पी जाता था, पर उन दिनों में हमने समोसा, मिठाई, चटनी कुछ भी नहीं खाया। इस सारे काम के लिए हमारे गांव का एक लड़का करतार था जो कि खुद तो जिम नहीं करता था पर उसने अपनी हवेली हमें दे रखी थी। उसने आकर बैठ जाना और कहना  करो करो, लड़कों  खूब मेहनत करो।  खूब बाडी बनाओ।
3 महीने बाद मेरी कमर 32 इंच हो गयी थी।

जिंदगी जीने के लिए बहुत ज्यादा सहूलतों की जरूरत नहीं होती,  जिंदगी हम जीते हैं अपने अंदाज से, अच्छे दोस्तों के साथ से।
 एक शेर है
 ले देकर अपने पास नज़र ही तो है
 क्यों देखें जिंदगी को, किसी ओर की नजरों से हम

 मुझे एक और किस्सा याद आ रहा है, कि रिंकू की दुकान के साथ वी सी आर की कैसेट दुकान होती थी। वह खुद तो नशेड़ी थाऔर  पर टिककर नहीं बैठता था । उसकी दुकान रिंकू और और उसके पिता जी देखते थे।
एक बार उसकी दुकान पर एक लड़का भागा भागा आया। वह बोला " अंकल , अंक्ल, प्यासी चुड़ैल चाहिए।
 रिंकू के पिताजी बहुत मजाक वाले थे, उन्होंने कहा,  बेटा प्यासी चुड़ैल तो नहीं है क्योंकि उसने पानी पी लिया है, अभी चुड़ैल ही है कहो तो ले जाओ।😁😁😁
 ऐसे ही कुछ और किससे लेकर आऊंगा।
 तब तक के लिए विदा लेता हूँ।
 आपका अपना
 रजनीश जस
 रूद्रपुर
 उत्तराखंड
29.03.2020
#sunday_diaries
#rudarpur_cycling_club



Thursday, March 26, 2020

Journey to Osho birth place Kuchwada, Madhya pardesh

आइए आपको आज लेकर चलते हैं ओशो की जन्म स्थान कुचवाड़ा, मध्य प्रदेश।
 ओशो का असली नाम रजनीश था।
वो अपने आप को भगवान कहलाते थे। लोगों ने विरोध किया तो उन्होनें कहा, तुम में भी भगवान है। ये भी एक इत्तेफाक है कि मेरा नाम भी रजनीश ही है। 😀😀

रजनीश का मतलब होता है रजनी +ईश ।
रजनी का मतलब रात,
और ईश का मतलब ,देवता,
रात का देवता चंद्रमा। फिर बाद में उन्होने अपना नाम ओशो रख लिया।
ओशो शब्द जापान से लिए एक शब्द के ऊपर है, जिसका मतलब है,  अत्यधिक गुणी भिक्षु।

बात लगभग 2009 जनवरी की है।  हमारी कंपनी का कंपोनेंट मंडीदीप,  मध्यप्रदेश में जाता था। पता चला एक कस्टमर कंप्लेंट आ गई और मुझे वहां पर भेजा गया।

उस वक्त मेरे मैनेजर ने टिकट तो बुक करवा दी थी तो उन्होंने मुझे सीट का नंबर बता दिया और बोले जाकर बैठ जाना। मैंने मैनेजर को बोला कि आप मुझ को टिकट का प्रिंट तो दे दो ,वो आनाकानी कर रहे था। मैंने कहा, मैं जाऊंगा ही नहीं, जब तक टिकट का प्रिंट नहीं दोगे। तब उसने टिकट का प्रिंट निकाल कर दिया।

 जनवरी के दिन थे मैं अपनी जैकेट वगैरह पहनकर चला ,मेरे साथ मेरा साथी रामनाथ था। हम सुबह अंबाला की स्टेशन पर पहुंच गए।
 चलो जी हम चल दिए मध्य प्रदेश की तरफ ट्रेन में । स्लीपर टिकट था और मैं साइड विंडो में बैठा हुआ था। बाहर देख रहा था । मैं पहली बार घर से इतनी दूर गया था।  इस बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जब मैं दिल्ली से अपनी मौसी के घर छोटे होते, बहादुरगढ़ गया था तो मैं सोच रहा था मुंबई यही बिल्कुल पास है । रास्ते में पेड़ , खेत खल्यान, पहाड़ देखता हुआ जा रहा था।

भोपाल पहुंचा।  वहां से एक मिन्नी बस चली और फिर हम मंडीदीप पहुंच गए। मंडीदीप एक इंडस्ट्रियल एरिया है।  वहां पर घूम फिर कर एक होटल का कमरा बुक किया। फर्सट फ्लोर  पर हमारा कमरा था। पहले दिन हमने होटल से खाना खाया और सो गये। सुबह उठे तो नहा धोकर फिर पास में ही है रेस्टोरेंट पर गए । उसका मालिक बहुत बातूनी था , उसने हमें साउथ इंडियन खाना खिलाया। हमने इडली खाई। उसकी दुकान भी फूस छप्पर  ही थी, ऊपर कच्ची छत्त नीचे  कच्ची मिट्टी। खाना खाने के बाद हम फिर फैक्ट्री पहुंच गए ।वहां पर अपना काम-वाम निपटाया ।
 उस फैक्ट्री में  एक लड़का धीरज मनोट नाम का था। वो पीपीसी  में था। एक दिन उसकी तबीयत थोड़ी खराब थी। थोडा बुखार और जुकाम था। मैनें कहा आओ मैं तुम्हारा अक्युप्रैशर कर देता हूँ। वहां पर कुछ पाइप लगे हुए थे,  वो उस पर बैठ गया। मैंने जैसे ही उसकी सिर के  पॉइंट का अक्युप्रैशर किया,  वह गिर गया। मैं घबरा गया पर वो तुरंत उठा और बोला, तुम्हारे हाथों में तो जादू है। मैं एकदम से ठीक हो गया हूँ।
 मैंने कहा, मैं तो घबरा गया था कि तुम पता नहीं क्या हुआ है?
 तब मैंने सोचा कि आगे से अगर कभी किसी आदमी का अक्युप्रैशर  करना हुआ तो कुर्सी पर बिठा कर आराम से ही करूंगा।

 मैनें  वँहा लोगों से बातचीत की कि पंजाब मे इन दिनों पूरी सर्दी है। उन्होंने कहा कि शुक्र करो कि आप जनवरी में आए हुए हो, अगर आप मई- जून में आते तो शायद यहां पर आपको ठंडा पानी पीने के लिए तरस जाते और बहुत ही ज्यादा गर्मी होती ।वहां पर गर्मी होने का कारण ये भी है कि  वहां से भूमध्य रेखा निकलती है और सूरज की  किरणें सीधी पड़ती हैं।

ऐसे ही तीन-चार दिन बीते और रविवार आने को हो गया। मैंने पता किया कि कुचवाड़ा यहां से कितनी दूर है? क्योंकि कुचवाड़ा ओशो की जन्म स्थल है। होटल के मालिक ने बताया कि लगभग 100 किलोमीटर है। हम रविवार को सुबह उठे 6:00 बजे और हमने लगभग होटल से 7:00 बजे निकल गए। पता चला है कि कुचवाड़ा के लिए जो बस चलती है वहां पर पहुंचे तो पता चला कि बस अभी थोड़ी देर हुई है निकली है।  दो लड़के वहां मोटरसाइकिल पर थे और उन्होंने कहा आप हमारे मोटरसाइकिल पर बैठ जाएँ हम आपको बस तक छोड़ देते हैं। हम लोग उनके मोटरसाइकिल पर बैठ गए और उन्होंने मोटरसाइकिल दौड़ाई। उन्होनें मोबाइल पर बस वाले को रोक दिया था। आगे हम बस में बैठ गये।
ये लड़के शायद बस वाले से कुछ कमिशन ले लेंगे।
  हम बस से देखते हुए जा रहे थे। 3- 4 घंटे के बाद बस ने हमें मेन रोड  पर उतार दिया। वहां से कुचवाड़ा कोई 5 या 6 किलोमीटर था। फिर वहां पर पैदल चल दिए। इर्द-गिर्द चने के खेत थे।हम  चने तोड़ते खाते हुए चलते रहे ।
कुछ नहीं मिला तो देखा वहां पर एक ट्रैक्टर आ रहा था। हम लोग ट्रैक्टर पर बैठ गये । फिर हम कुचवाड़ा पहुंच गए। ओशो के घर बारे में पता किया कि उनका जन्म स्थान कहां है? कच्ची सड़क थी।थोड़ा चलने के बाद देखा तो किसी ने बताया कि वो सामने की झोंपडी ही ओशो का जन्म स्थान है। मैं वँहा जाकर बैठ गया और  आंखें बंद कर ली और इस जगह को महसूस करने लगा। क्योकिं यँहा पर इस सदी के एक महान सदगुरू का जन्म हुआ, उनकी कुछ तरंगें हवा में तो मौजूद होंगी। As Great Sientist , Albert Einstein said, "Energy can neither be created nor be destroyed, but one form of energy can be converted to another."
तो मुझे यकीन था वो किसी ना किसी ओर रूप में यँहा होंगें।

वँहा से दो छोटे छोटे पत्थर उठाये और अपने पास रख लिए,एक याद के तौर पर। सामने ही कच्चे  पीछे वह तालाब था जिसमें ओशो खेलते थे।
वो बचपन में बहुत शरारती थे। ओशो की किताब " मेरा स्वर्निम बचपन", उनके बचपन की शरारतों से भरपूर है।

 यहां पर यह बताना जरूरी है कि ओशो अपनी नानी के पास इसी घर में रहे। अभी कुछ समय पहले ओशो की जिंदगी पर एक हिंदी फिल्म भी बनी है, Rebellious Flower। फिल्म में इसी जगह की कहानी है।
 Osho Birth Place( Shared from Google)
उसके बाद वह जबलपुर में फिलास्फी की प्रोफ़ेसर रहे। फिर उन्होंने पूरा भारत घूमा। उसके बाद फिर वह अमेरिका चले गये। उनके इर्द गिर्द दुनिया के मशहूर डाक्टर,प्रोफेसर, चिंतक, कलाकार इक्ट्ठे होने लगे।
अमेरिका में 1981 -88 ओरेगन में कई एकड़ बंजर जगह को हरे भरे उपवन में बदल दिया। वहां पर लोग ध्यान करने लगे थे,  ये बात अमेरिका  नाकाबिले बर्दाश्त थी । ओशो को शुक्रवार को गिरफ्तार किया,  शनिवार रविवार को कोर्ट बंद थी। सोमवार को पूरे विश्व में चर्चा हुई और फिर उनको  ओशो को रिहा करना पड़ा क्योंकि उसको के खिलाफ उनके पास कोई सबूत नहीं था।वो फिर विश्व भर में घूमे। फिर वो नेपाल से होते हुए मुंबई में आए। फिर उन्होंने अपना आश्रम पुणे में बनाया। पुरातन भारत की और इस युग के मनोविषलेश्क सिगमंड  फ्रायड , कार्ल गुस्ताख़ जुंग की सोच को लेकर ध्यान की विधियाँ बनाईं कि आधुनिक मनुष्य घर में रहकर सन्यास की यात्रा कर सकें।
उन्होनें कहा, संसार से भागो मत, बल्कि जागो।
शायद गोरखनाथ ने कहा है, हँसिबा खेलिबा, करिबा ध्यानम।
इस युग की शानदार खोज , डायनामिक मेडिटेशन है, जिसमें आदमी के मन में दबी हुई भावनाओं को बाहर निकालकर , उसे सहज बनाने के मार्ग पर अग्रसर किया।
आज तक दुनिया भर में जितने भी बुद्धपुरूष हुए हैं , जैसे जीसस, मीरांबाई, सुकरात, जरातुस्त्रा, महात्मा बुद्ध, गुरु नानक देव जी, लाओत्से, महांवीर,जे क्रष्णामूर्ती ....बहुत लंबी कडी है , उन सभी की शिक्षा को बहुत सरल ढंग से दुनिया के आगे रखा।
                             Osho

 ओशो की जब मृत्यु हुई तो उन्होनें पहले ही कह दिया था कि मेरे को रोते हुए  विदा मत करना। मैंने जो भी चाहा वो किया है, तो मुझे नाचते गाते हुए ही इस संसार से विदा करना।तो ऐसा ही हुआ उनके पार्थिव शरीर को नाचते गाते हुए सन्यासी लेकर गए।वो तमाम उम्र बहुत सारी चीजों के लिए विवाद में रहे , जैसे कि उनकी एक किताब थी संभोग से समाधि की ओर, फिर से रोल्स रॉयस कारों के लिए।

मेरे पिता गुरबख्श जस ने ओशो के साहित्य को पंजाबी में अनुवाद किया। इस काम के लिए ओशो से written permission ली थी।

आईए मुड़ते हैं यात्रा पर,
तभी मेरे  दोस्त का कनाडा से फोन आ गया। मैं बात करने लगा। मैंने उसे बताया कि मैं ओशो की जन्म स्थान के बाहर बैठा हूँ। दोस्त ने कहा कि मेरी तरफ से भी नमन कर देना। फिर हम ओशो का आश्रम की तरफ चल दिए।  वहां पर ₹5 की टिकट टिकट खरीद के अंदर गये। मैंने पूछा ऐसा क्यों? तो  उन्होंने बताया कि गाँव के लोग परेशान करते थे, अंदर आकर फूल तोड़ लेते थे। इसलिए हमने  टिकट रख दी। हम अंदर गये तो देखा, वँहा बहुत फूल खिले हुए थे। वैसे भी जनवरी का महीना फूलों का ही होता है। गाँव में पैदल घूमते रहे ।  हम मेन रोड पर आ गये। वहां पर एक ढाबे पर  रोटी खाई और फिर बस पकड़कर शाम को 7:00 बजे अपने होटल के कमरे में आ गए। मैं वहां जितने भी दिन रहा उस होटल वाले ने अलग अलग साऊथ इंडियन खाना खिलाया। जिस दिन मेरी वापसी थी तो उसने मुझे मुफ्त में खाना खिलाया।

 फिर मिलूंगा एक नयी यात्रा के साथ। तब तक के लिए विदा लेता हूँ।
 आपका अपना
 रजनीश जस
रुद्रपुर
उत्तराखंड
26.03.2020
#kuchwada
#osho_birth_place

Saturday, December 7, 2019

#people_have_no_hobby

#People_have_No_hobbies
किसी कारण से हस्पताल में जाना हुआ।  एक औरत अपने पति के बारे में बता रही  उसके पति रिटायर हो गए है उन्हें कोई शौक नहीं है,  बस सिगरेट पीने के इलावा।  सारा दिन सिगरेट ही सिगरेट। सारे घर में धुँआ ही धुँआ।  उस औरत को भी एलर्जी हो गई। पहले आठ साल सिगरेट छोड़ दी,  पर अब वो दोबारा पीने लगे। कई दिन से शराब भी पी रहे थे।  अब एक दिन लगभग एक घंटा लगातार खांसी हुई तो वो कहने लगा मुझे बचा लो। तो वो उसे हस्पताल ले आए। बच्चे कहने लगे,  कुछ देर और रहने दो पिता जी को। वो औरत कहने लगी,  समाज में रहना है और वह मेरे पति हैं।
जो लोग बिना किसी शौक के जिंदगी जीते हैं वो  ऐसे ही करते हैं और जीवन खोे देते हैं।
मैं ऐसे कई लोगोँ को जानता हूँ जिन्हें ये नही जानते कि  उन्हें क्या शौक है?
कुछ दिनों पहले छह बार एवरेस्ट विजेता #lovraj जी से हुई वो बता रहे थे कि एवरेस्ट चढ़ते हुए एक अंग्रेज को सिगरेट की तलब लगी कहने लगा कि नीचे वापिस जाकर सिगरेट ले आता हूँ।  तब लवराज सिंह ने कहा यही परीक्षा है  अब अगर रूके तो संकल्प बनेगा। वो पीछे नहीं मुड़ा।  अगले साल उसने बताया वो सिगरेट छोड़ चुका है।
ओशो कहते हैं सिगरेट पीने पर जो उसके धुएँ से मुंह में जीभ के ऊपर तालुए में गर्मी मिलती है वो बिल्कुल वैसी ही है जैसे बचपन में मां के दूध से मिलती थी, वो सुख की अनुभूति आदमी ऐसे ढूंढने में जीवन खो देता है।
जो बच्चे अपनी माँ का दूध नहीं पीते वो सिगरेट बहुत पीते हैं। यही कारण है पश्चिम में सिगरेट का बहुत चलन है।
अब तो लड़कियों में भी सिगरेट का शौक पैदा हो गया है,  क्योंकि वो भी आदमी की बराबरी की दौड़ में ये सब शुरू कर रही हैं।  शहरों में अकेलापन मिटाने के लिए डिस्को में ये सब हो रहा है।
#Rajneesh Jass
Rudrapur
Uttrakhand

Tuesday, November 26, 2019

मौजूदा समाज में एल्डस हक्सले के नावल ब्रेव निऊ वल्ड की प्रसांगिकता

कुछ दिनों पहले गली में तौलिये  में बेचने के लिए एक आदमी आया।  वो  तौलिए के 80 रुपये दाम बता यहा  था और लोगों ने 50 तक खरीद लिए । अगर यही तौलिया शोरूम को बिके तो बहुत महंगा होगा।  कई लोगों ने 40 में भी खरीदा। ये तौलिए  गांव की महिलाएँ हाथ से बनाती हैं और कुछ लोग शहर में आते हैं और इसे बेचते हैं।


यह सब देखकर, मुझे फिल्म "मटरु की  बिजली का मंडोला" का डायलॉग याद आ गया।
खाली ज़मीन  को देखकर एक मंत्री किसी उद्योगव्यक्ति से बात करता है, वहाँ बहुत बड़े कारखाने लाए जा सकते हैं। उद्योगव्यक्ति  बोला, तब तो लोग इसमें काम करके अमीर बन जाएँगे। तो मंत्री हंस कर कहता है, नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। हम पास में एक बिग बाजार बनाएंगे, शराब के ठेके , पिज्जा हट , डिस्को बार खोलेंगे। वो काम करने के बाद अपने मनोरंजन के लिए वहां पर जाएंगे और सारे पैसे वहीं पर खर्च देंगे।
 जो कि काम करने वालों लगेगा वो कमा रहे हैं, पर वो  पैसे को हमारी जेब में दोबारा लौट आएगा।

यही है, आजकल टैक्सी हम मोबाइल पर बुक करते हैं, अब हम ऑनलाइन बुक करते हैं और घर आर्डर करते हैं। सब कुछ बैठे बिठाए होने लगा  है।  पैसा आम आदमी के पास  आने की बजाय  पूंजीपतियों के हाथ में जा रहा है
धीरे-धीरे हम मशीन से इतने अधिक मोहग्रस्त हो गए हैं कि इसके बिना जीना बहुत मुश्किल हो गया है।
मुझे याद है कि मैंने ऐल्डस हक्सले के उपन्यास "द ब्रेव न्यू वर्ल्ड"   टेंथ क्लास में पढ़ा था, मैं बहुत प्रभावित हुआ और कई दिनों तक मैं एक अजीब सोच में डूबा रहा।
यह उपन्यास आजकल सही साबित हो रहा है। इस उपन्यास में बच्चे, एक लेबारट्री की टेस्ट ट्यूब पर पैदा किए जा रहे थे। एक व्यक्ति यह सब देखता है। टेस्ट टिऊब में पैदा होने वाले लोग खुश रहने के लिए सोमा नाम की एक दवा खाते हैं। एक श्रमिक वर्ग है, एक प्रबंधक है। अगर प्रबंधक किसी कार्यकर्ता को थप्पड़ भी मारता तो वह विरोध नहीं करता।
वो विद्रोही व्यक्ति कहता है कि यह सही नहीं है   डॉक्टर कहता है इससे शहर में शांति बनी रहेगी। वह सभी डॉक्टरों के साथ बहस करता है।

अंत में, विद्रोही आदमी की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है।
 तब यह कहा जाता है कि अब एक नया संसार पैदा हो गया है जिसका नाम है ब्रेव न्यू वर्ल्ड ।क्योंकि लगभग सारे लोग मशीनों जैसे हो गए है जिनके दिल में कोई भावना ही नहीं है।

यह उपन्यास लगभग 1910 में लिखा गया था लेकिन यह आज भी प्रासंगिक है।
 मेरा कहना है, हम मशीनों का उपयोग ज़रूर  करें , पर मशीनों को अपना मालिक ना बनने दें। क्योंकि अगर मशीन हमारी मालिक बन गईं तो हम सारा जगत भावनाविहीन हो जाएगा।

 यहां पर यह बताना जरूरी होगा कि एल्डस हक्सले ने  सिनेमा के आने पर यह कहा था कि आदमी की सोच को खत्म करने वाला पहला यंत्र आ गया है। रेडियो की खोज और टीवी कोड पर भी उसने यही कहा था।

 अगर देखा जाए मानव और मशीन में यही फर्क है तो मशीन कुछ महसूस नहीं करती,  वह सिर्फ एक निर्देश का पालन करती है।  ओशो कहते हैं आदमी में बहुत सारी संभावनाएं हैं। हर बच्चा एक बुद्ध  बनने की संभावना लेकर पैदा होता है। उसको अगर सही राह मिले तो वह  बुद्ध बन सकता है।  पर मशीन में ऐसा कुछ भी नहीं है,  वो मशीन है और मशीन ही रहेगी।


मैं निराश नहीं हूं मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि जब भी कोई रेहडी वाला या हस्तशिल्प अपना समान बेचे,  तो हम उन्हें उचित मूल्य दें।
हम बिग बाजार में ब्रांडेड सामान खरीदने के लिए जाते हैं, वँहा एक भी रूपया कम नहीं होता,पर हम 5 या 10 रूपये के लिए रिक्शा वाले से बहस करने लग जाते हैं।

मैं अपने आस-पास के लोगों, पति-पत्नी दोनों को संघर्ष करते हुए देखता हूं।  मकान की किश्तों और बच्चों की पढाई  में एक मध्यम वर्गीय परिवार 20 साल तक कर्ज़ में डूब जाता है। उसे जीवन जानने का,इसकी खूबसूरती का, इसके सौंदर्य का पता ही नहीं चलता।
भारत जैसे देश में 99% ऊर्जा सिर्फ और सिर्फ जीवन की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाती है।

मध्यवर्गी लोगों के हाथ पैसा आता तो है, लेकिन फिर घूम फिरकर  पूंजीपति के हाथ में चला जाता है।

फिर भी, मैं बेहतर भविष्य की कामना करता हूं।

रवींद्रनाथ टैगोर कहते हैं,
"हर नवजात शिशु भगवान के आशावान होने का प्रतीक है।"
इसलिए हम  एक अच्छे भविष्य की आशा करते हैं।

एक गीत की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं

इन काली सदियों के सर से
जब रात का आंचल ढलकेगा
जब अंबर झूम के नाचेगा
जब धरती नग्मे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

# रजनीश जस
रुद्रपुर
उत्तराखंड
#rajneesh_jass
27.11.2019




Saturday, October 26, 2019

पुस्तकें और बिग बाजार कल्चर

 सृजनात्मक पुस्तकें समाज को एक दिशा देने का काम करती हैं। बिग बाजार सिर्फ और सिर्फ उपभोक्तावादी समाज को बढ़ावा दे रहा है। अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां खुश और शांत चित्त रहें, तो हर बिग बाजार में कम से कम एक किताबों की एक दुकान जरूर होनी चाहिए अन्यथा समाज केवल मशीन रूपी इन्सानों से भर जाएगा।
मुझे अपने पिता के एक दोस्त, राजकुमार, जो ओशो के सन्यासी हो गए। उन्होंने घर छोड़ दिया और जबलपुर, ओशो में आश्रम में ओशो साहित्य बेचना शुरू कर दिया। जब वह अपने गाँव आए, तो उनके पिता ने मेरे पिता से कहा कि आप उन्हें समझाएं कि यह दुकान पर बैठे जो कि इसे जीवन के बारे में कुछ पता चले। तब राजकुमार ने कहा कि आप जीवन के बारे में कुछ नहीं जानते, जो कि आप ओशो, चैखोव, टॉलस्टॉय के बारे में कुछ नहीं जानते हैं।
उनके पिता ने कहा, जस जी मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि ये किसी आदमी का नाम ले रहा है या किसी ओर का?

मेरे पास एक कुलीग राजु विश्वकर्मा है जो मैकेनिकल डिग्री करने के लिए बुंदेलखंड गया था। उनकी रुचि साहित्य में थी। उन्होंने पुस्तकालय से अमृता प्रीतम की आत्मकथा रसीदी टिकट लेकर पढा।लिया। किसी कारण से वह बठिंडा आ  डिग्री कालेज आ गया। पर वहाँ के पुस्तकालय में साहित्य की एक भी पुस्तक नहीं मिली, हालाँकि, बठिंडा  साहित्यिक रूप से बहुत धनी शहर है।

पाश ने एक बात कही है, उनकी कविता
 "मैं विदा लेता हूंँ मेरी दोस्त" में ,
, "प्यार करने और जीना उन्हें कभी ना आएगा जिन्हें जिंदगी ने बनिया बना दिया ।"
इसका मतलब यह नहीं है कि पाश एक जाति के बारे में बात कर रहा है, वह बात कर रहा है कि सिर्फ पैसा बनाने से खुशी नहीं मिलती , प्यार और जीवन इससे बहुत आगे की बात है।
जंग बहादुर गोयल ने अपनी पुस्तक विश्व साहित्य के शाहकार नावल में लिखा है कि वे एक तकनीकी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में गए और पाया कि वँहा लगभग 50,000 किताबें थीं। उन्होंने स्वाभाविक रूप से पूछा,  यहां गोर्की, टॉल्स्टॉय या मुंशी प्रेमचंद की किताबें हैं?
 फिर यह पता चला कि यँहा ऐसी कोई किताब नहीं थी। तो सवाल उठता है कि हम किस तरह के इंजीनियरों का पैदा कर रहे हैं?
कलकत्ता छह नोबेल पुरस्कार विजेताओं के साथ दुनिया का सबसे बड़ा नोबेल पुरस्कार विजेता शहर बन गया है। बंगाल में एक खास बात है, चाहे वँहा इंजीनियर हो या डॉक्टर, एक विषय कला की आवश्यकता है। यही कारण है कि वे कला से प्यार करते हैं।वँहा चाय के खोखे में एक लेखक की तस्वीर ज़रूर  होगी।
 मैं यह नहीं कहता कि हम बिल्कुल कोरे हैं, लेकिन अगर हम अपनी जड़ों से जुडे रहना है तो किताबों से जुड़ना होगा।

 इसलिए बच्चों के सामने बैठकर किताबें पढ़ें, ताकि वे भी सीख सकें। अगर हम चाहते हैं हमारे बच्चे पैसा बनाने की मशीन न बने, बल्कि इंसान बनें  तो उन्हें ये सिखाना होगा, कि जीने के लिए पैसा कमाना है, ना कि पैसा कमाने के लिए जीना है। ये एक बहुत बडा  बुनियादी भेद है।

 मैं भी जब कभी मैं मोबाइल में खो जाता हूं, तो  किताबों का जादू मुझे बाहर खींच लाता है।

आपका धन्यवाद
रजनीश जस
26.10.2019

ਕਿਤਾਬਾਂ ਤੇ ਬਿਗ ਬਜ਼ਾਰ ਸੱਭਿਅਤਾ

ਉਸਾਰੂ ਕਿਤਾਬਾਂ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਸੇਧ ਦਿੰਦਿਆਂ ਨੇ।  ਬਿਗ ਬਜ਼ਾਰ ਸਿਰਫ ਤੇ ਸਿਰਫ, ਖਪਤਵਾਦੀ ਸਮਾਜ ਨੂੰ ਵਧਾਵਾ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਜੇ ਅਸੀਂ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਆਉਣ ਵਾਲਿਆਂ ਪੀੜੀਆਂ ਦਾ ਮਨ ਖੁਸ਼ੀ ਤੇ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਰਹੇ ਤਾਂ ਹਰ ਬਿਗ ਬਾਜ਼ਾਰ ਵਿਚ ਘੱਟੋ ਘੱਟ ਇਕ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦੀ ਦੁਕਾਨ ਹੋਣੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ। ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਸਮਾਜ ਸਿਰਫ ਮਸ਼ੀਨ ਰੂਪੀ ਇਨਸਾਨ ਨਾਲ ਭਰ ਜਾਵੇਗਾ ।
ਮੈਨੂੰ ਯਾਦ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ ਮੇਰੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਦਾ ਇਕ ਮਿੱਤਰ ਰਾਜਕੁਮਾਰ, ਓਸ਼ੋ ਦਾ ਸੰਨਿਆਸੀ ਹੋ ਗਿਆ। ਉਹ ਘਰਬਾਰ  ਛੱਡਕੇ ਓਸ਼ੋ ਦੇ ਜਬਲਪੁਰ ਵਾਲੇ ਆਸ਼ਰਮ ਵਿਚ ਰਹਿਕੇ ਓਸ਼ੋ ਸਾਹਿਤ ਵੇਚਣ ਲੱਗਾ । ਜਦ ਉਹ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ ਆਇਆ ਤਾ ਉਸਦੇ ਪਿਤਾ ਨੇ ਮੇਰੇ ਬਾਪੂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਕਿ ਤੁਸੀਂ ਇਸਨੂੰ ਸਮਝਾਓ ਕਿ ਇਹ ਹੱਟੀ ਤੇ ਬੈਠੇ ਤਾਂ ਜੋ ਇਸਨੂੰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਬਾਰੇ ਕੁਝ ਪਤਾ ਲੱਗੇ।  ਤਾਂ ਅੱਗੋਂ ਰਾਜਕੁਮਾਰ ਨੇ ਕਿਹਾ ਤੁਹਾਨੂੰ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਬਾਰੇ ਕਿ ਪਤਾ ਹੋਵੇਗਾ ਤੁਸੀਂ , ਓਸ਼ੋ, ਚੈਖ਼ੋਵ,ਟਾਲਸਟਾਏ ਬਾਰੇ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ।
ਉਸਦੇ ਪਿਤਾ ਨੇ ਕਿਹਾ,  ਜੱਸ ਸਾਬ ਮੈਨੂੰ ਤਾਂ ਇਹ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ ਕੇ ਇਹ ਕਿਸੇ ਆਦਮੀ ਦਾ ਨਾਮ ਲੈ ਰਿਹਾ ਹੈ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਕਿਤਾਬ ਦਾ ?

ਮੇਰਾ ਇਕ ਕੁਲੀਗ ਹੈ ਰਾਜੂ ਵਿਸ਼ਵਕਰਮਾ ਜੋ ਮਕੈਨੀਕਲ ਵਿਚ ਡਿਗਰੀ  ਕਰਨ ਬੁੰਦੇਲਖੰਡ ਗਿਆ। ਉਸਨੂੰ ਸਾਹਿਤ ਵਿਚ ਰੁਚੀ ਸੀ। ਉਸਨੇ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਵਿਚੋਂ ਅਮ੍ਰਿਤਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਦੀ ਸਵੈ ਜੀਵਨੀ ਰਸੀਦੀ ਟਿਕਟ ਲੈਕੇ ਪੜ੍ਹਿਆ।ਫਿਰ  ਕਿਸੇ ਕਾਰਨ ਕਰਕੇ ਉਹ ਬਠਿੰਡੇ ਆਕੇ ਡਿਗਰੀ ਕਾਲਜ ਆ ਗਿਆ। ਉੱਥੇ ਦੀ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਵਿਚ ਇੱਕ ਵੀ ਸਾਹਿਤ ਦੀ ਕਿਤਾਬ ਨਹੀਂ ਮਿਲੀ। ਹਲਾਂਕਿ ਬਠਿੰਡਾ ਸਾਹਿਤਿਕ ਪੱਖੋਂ ਬਹੁਤ ਧਨੀ ਹੈ।

ਪਾਸ਼ ਨੇ ਇਕ ਗੱਲ ਕਹੀ ਹੈ, ਆਪਣੀ ਕਵਿਤਾ
 " ਮੈਂ ਵਿਦਾ ਲੈਂਦਾ ਹਾਂ ਮੇਰੀ ਦੋਸਤ " ਉਸ ਵਿਚ ਇਕ ਬਹੁਤ ਗਹਿਰੀ ਗੱਲ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ
," ਪਿਆਰ ਕਰਨਾ ਤੇ ਜਿਉਣਾ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਕਦੇ ਵੀ ਨਾ ਆਏਗਾ, ਜਿਹਨਾਂ ਨੂੰ ਜਿੰਦਗੀ ਬਾਨੀਆ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ।"
ਇਸਦਾ ਮਤਲਬ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਿ ਪਾਸ਼ ਕਿਸੇ ਜਾਤੀ ਬਾਰੇ ਕਹਿ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਗੱਲ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਸਿਰਫ਼ ਪੈਸੇ ਕਮਾਉਣ ਨਾਲ ਸੁਖ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ, ਪਿਆਰ ਕਰਨ ਤੇ ਜਿਉਣਾ ਉਸ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਅਲੱਗ ਹੈ।
ਜੰਗ ਬਹਾਦੁਰ ਗੋਇਲ ਜੀ ਨੇ ਆਪਣੀ ਕਿਤਾਬ ਵਿਸ਼ਵ ਸਾਹਿਤ ਦੇ ਸ਼ਾਹਕਾਰ ਨਾਵਲ ਵਿਚ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਕਿਸੇ ਟੈਕਨੀਕਲ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੀ ਲਾਇਬ੍ਰੇਰੀ ਵਿਚ ਗਏ ਤਾਂ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਉੱਥੇ ਲਗਭਗ 50 ਹਜਾਰ ਕਿਤਾਬਾਂ ਨੇ।
ਓਹਨਾ ਨੇ ਸੁਭਾਵਿਕ ਹੀ ਪੁੱਛ ਲਿਆ ਇਥੇ ਗੋਰਕੀ,  ਤਾਲਸਤਾਏ ਜਾਂ ਮੁਨਸ਼ੀ ਪ੍ਰੇਮਚੰਦ ਦੀਆ ਕਿਤਾਬਾਂ ਨੇ?
 ਤਾ ਅੱਗੋਂ ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਉਥੇ ਅਜਿਹੀ ਇਕ ਵੀ ਕਿਤਾਬ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਤਾਂ ਇਹ ਸਵਾਲ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਅਸੀਂ ਕਿਸ ਤਰਾਂ ਦੇ ਇੰਜੀਨੀਅਰ ਪੈਦਾ ਕਰ ਰਹੇ ਹਾਂ ?
ਕਲਕੱਤਾ ਦੁਨੀਆਂ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨੋਬਲ ਪੁਰਸਕਾਰ ਜਿੱਤਾਂ ਵਾਲਾ ਸ਼ਹਿਰ ਬਣ ਗਿਆ ਹੈ ਜਿਥੇ 6 ਨੋਬਲ ਪੁਰਸਕਾਰ ਵਿਜੇਤਾ ਹੋਏ ਨੇ। ਬੰਗਾਲ ਵਿਚ ਇਕ ਗੱਲ ਹੈ ਕੇ ਚਾਹੇ ਕੋਈ  ਇੰਜੀਨੀਅਰ ਬਣੇ ਜਾਂ ਕੋਈ ਡਾਕਟਰ ਉੱਥੇ ਇਕ ਵਿਸ਼ਾ ਆਰਟ ਦਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ।ਇਹੀ ਕਾਰਣ ਹੈ ਓਹਨਾ ਵਿਚ ਕਲਾ ਲਈ ਮੁਹੱਬਤ ਦਾ। ਉਥੇ ਇੱਕ ਚਾਹ ਵਾਲੇ ਖੋਖੇ ਵਿਚ ਵੀ ਕਿਸੇ ਸਾਹਿਤਕਾਰ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਮਿਲ ਜਾਏਗੀ।
 ਮੇਰਾ ਅਜਿਹਾ ਕਹਿਣਾ ਨਹੀਂ ਕਿ ਅਸੀਂ ਬਿਲਕੁਲ ਕੋਰੇ ਹਾਂ ਪਰ ਜੇ ਅਸੀਂ ਆਪਣੀਆਂ ਜਡ਼ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਰਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿਤਾਬਾਂ ਬਹੁਤ ਜ਼ਰੂਰੀ ਨੇ।

 ਸੋ ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹੋ , ਬੱਚਿਆਂ ਸਾਮਣੇ ਤਾਂ ਜੋ ਉਹ ਵੀ ਸਿੱਖਣ। ਅਸੀਂ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਪੈਸੇ ਕਮਾਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਇਨਸਾਨ ਬਣਾਉਣਾ ਹੈ, ਜੋ ਕਿ ਜਿਉਣ ਲਈ ਪੈਸੇ ਕਮਾਉਣ, ਨਾ ਕਿ ਪੈਸੇ ਕਮਾਉਣ ਲਈ ਜੀਣ।
 ਮੈਂ ਵੀ ਕਈ ਵਾਰ ਜਦ ਮੋਬਾਈਲ ਵਿਚ ਗੁਆਚ ਜਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ਤਾਂ ਫਿਰ ਕਿਤਾਬਾਂ ਦਾ ਜਾਦੂ ਮੈਨੂੰ ਬਾਹਰ ਕੱਢ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।

ਧਨੰਵਾਦ
ਰਜਨੀਸ਼ ਜੱਸ
26.10.2019

Sunday, September 29, 2019

Cycling with tea 29.09.2019


आज सुबह साइकिलिंग के लिए तैयार  हो रहा था तो शिवशांत आ गया। उसके साथ निकला। इस साल अच्छी बारिश होने से हर तरफ हरे पेड़ दिखाई दे रहे हैं । जैसे ही हम मेन रोड पर आए तो हमने देखा कि एक मैराथन हो रही है।लोग सफेद टी शर्ट पहनकर  दौड़  रहे थे। साथ में मीडिया वाले फोटोग्राफी कर रहे थे। जैसे ही हम आगे गए तो संजीव जी मिल गए। वह पैदल आ रहे थे। पैदल सैर कर रहे थे , राजेश सर स्टेडियम में थे । आज जब  हम फोटोग्राफी कर रहे तो एक चिड़िया चहक रही थी, उसकी वीडियो बनाई । फिर हम तीनों ने मिलकर आँखें बंद करके उस चिड़िया की और झींगुर की आवाज़ का आनंद लिया।

फिर राजेश सर को साथ मिलकर चाय के अड्डे पर पहुंच गए। चाय के अड्डे पर वहां बैठकर बातें शुरू हुईं, पर्यावरण को लेकर ।

बात हुई एक अमला रोया नाम की एक औरत की , जिनको पानी माता (वाटर मदर) के नाम से जाना जाता है। उन्होने  राजस्थान के 100 गांव में 200 से ज्यादा चेक डैम बनाए हैं जिसके कारण वहां के लोगों को रोजगार मिला है, वह खेती करने लगे हैं, उन्होने पशु पालन भी शुरू किया है। चेक डैम बारिश के पानी को रोककर बनाए जाने वाले छोटे छोटे डैम हैं। गांव में खेती होने के कारण लोगों ने अच्छे जीवन शैली को अपनाया है।
 लड़कियों ने स्कूल में जाना शुरु किया है क्योंकि उनको अपने मां-बाप के साथ  काम नहीं करना पड़ रहा है।
 डैम बनाने के लिए 30% ऐसा वहां के लोग और 70% उनकी एनजीओ देती है,जिसका नाम आकार चेरीटेबल ट्रस्ट है।
आकार एनजीओ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश , उड़ीसा ओर  बहुत सारे राज्य में काम कर रही है। अमला रूईया और उनकी टीम को इस काम के लिए बहुत-बहुत बधाई। वो केबीसी कार्यक्रम में भी आई थी।

जब भी बारिश होती है पेड़ ना होने के कारण जो पानी होता है बहकर नदी नालों  में चला जाता है। अगर पेड़ होंगे तो उनकी जड़ से पानी रुकेगा , मिट्टी का कटाव भी रूकेगा। रुका हुआ पानी ज़मीन के अंदर जाएगा और  वाटर लेवल ऊपर आएगा फिर उस पानी से खेती हो सकती है और   वो पीने के काम आ सकता है l

 सुरजीत सर ने एक वीडियो शेयर की थी जिसमें एक आश्रम दिखाया गया था ओरविल्ले।  यह स्वामी अरविंदो का आश्रम है , पांडिचिरी में । इसमें 42 देशों के , 2500  लोग रहते हैं । यहां पर बिना पैसे के काम होता है।  पूजा के लिए कोई मूर्ति नहीं है बल्कि एक मंदिर है , वहां पर सभी लोग मौन रहते हैं।
 स्वामी अरविंदो के बारे में  बताना चाहूंगा कि  स्वामी अरविंदो को उसके पिताजी ने बचपन मे  ही बाहर इंग्लैंड में भेज दिया था। उनको ये नहीं बताया गया उनका देश , धर्म और जाति क्या है?  उनकी अध्यात्मिक परवरिश वहां से प्रारंभ हुई। इसके दौरान उसके पिताजी की भारत में मृत्यु हो गई पर उनके पिताजी ने यह भी कहा कि ये बात अरविंदो  को मत बताना। फिर वह भारत लौटे और पांडिचेरी में उन्होंने एक आश्रम बनाया ।
 जो लोग वहां पर रह रहे हैं इस बात का प्रतीक है कि मन की शांति के लिए  कोई आदमी क्या क्या कर सकता है? उन्होंने अपना मुल्क छोड़ दिया और  वो भारत में अपना जीवन यापन कर रहे हैं ।  वह एक  बुद्ध पुरुष थे जिनके आश्रम भारत और बाहर  के मुल्कों में भी हैं। लोग उनको बहुत पढ़ते हैं, ध्यान करते हैं। उत्तराखंड रामगढ़ के पास भी उनका एक आश्रम है यहाँ का जिक्र  मेरी एक यात्रा में है।
अगर हम चाहते हैं इस विश्व में शांति हो तो इस में तो पहले हमें खुद शांत होना होगा , सहज होना होगा ।

  फिर आबादी को लेकर चर्चा हुई कि जितने हमारे जंगल कट रहे हैं , सड़कें चौड़ी हो रही हैं, वो  बढ़ती हुई अबादी के कारण हो रहा है। इस क्षेत्र में  लोगों को ही कुछ ठोस कदम उठाने होंगे,  वर्ना राजनीतिक पार्टियों के लिए तो आम आदमी सिर्फ एक वोट ही है और इससे ज्यादा कुछ नहीं।

सुरजीत सर आज किसी खास काम की वजह से नहीं आ पाए।

बातें करते करते हमने चाय पी।

 फिर मिलेंगे कि नहीं किस्से के साथ ।
आपका अपना
रजनीश जस
रूद्रपुर
उत्तराखंड